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कहानी: मुफ्त की दुकान

ग्राम चैनपुरा की शासकीय प्राथमिक शाला के प्रभारी शिक्षक ब्रजकिशोर जी  को पन्द्ह साल हो गए थे नौकरी करते हुए गाँव में एक और प्राइवेट स्कूल था। उसमें गाँव के संपन्न और ऊँची जाति के लोगों के बच्चे पढ़ते थे। जबकि गरीब णजदूरों के बच्चे  सरकारी स्कूल में शिक्षक ब्रजकिशोर जी उनके लिए मुफ्त की दुकान लगाते थे। जिसका संचालन वे स्कूल के बच्चों से ही कराते थे सामग्री लाना उनका काम था। आज दुकान पर दो सो रुपये का सामान बिका था । जिसकी कीमत वे अदा कर रहे थे बच्चों के लिए तो वो दुकान मुफ्त थी। 
इन पन्द्रह सालों में सरकारी स्कूल के बच्चों ने बहुत तरक्की की थी। उनके पढ़ाए हुए बच्चे हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहे थे। ज्यादातर युवकों की नौकरी लग गई थी। वे सब दलित परिवार के थे। लेकिन अब सब संपन्न होते जा रहे थे। कोई ऐसा दलित परिवार नहीं था जिसका एक भी सदस्य सरकारी नौकरी नहीं कर रहा हो। इसके कारण गाँव में खेतिहर मजदंरों का अकाल पड़ गया था। उन्हें बाहर से मजदूर लाने पड़ते थे। जो मँहगे पड़ते थे ।प्राइवेट स्कूल लूट का अड्डा था ड्रेस मँहगी कपड़ा  किताब मँहगी जूते टाई बेल्ट सब मँहगे तगड़ी फीस  और तामझाम ज्यादा। प्राइवेट स्कूल के शिक्षक भी उतने योग्य नही थे। फिर भी प्राइवेट स्कूल  में बच्चों की भरमार धी।गाँव के दबंग ब्रजकिशोर जी से  चिड़े रहते थे कई कहते कि गाँव में जो मजदूरों का अकाल पड़ा है वो इन्हीं के कारण हुआ है। जबकि ब्रजकिशोर जी सिर्फ अपने काम पर फोकस करते थे। एक दिन ब्रजकिशोर गाँव के दलित पंच  फूल चंद्र से कह रहे थे जो बेल्ट प्राइवेट स्कूल वाले डेढ़ सौ रपये में दे रहे हैं  वो बेल्ट वे चालीस रुपये  में थोक के भाव?लाए हैं। ऐसे ही टाई साढ़े तीन सौ की प्राइवेट स्कूल वाले दे रहे थे पर सरकारी स्कूल के बच्चों के लिए  वे सब चीजें मुफ्त की थीं। ब्रजकिशोर जी को शहर  के  कई बड़े लोग  मदद करते थे । ब्रजकिशोर जी हर  बालक के खाते में दो सौ रुपये प्रतिमाह डालते थे वो बेलेंस के रूप में मुफ्त की दुकान  पर रहते थे।उस से वे बालक सामान खरीद सकते थे जिसके रेट आश्चर्यजनक रूप से कम रहते थे। ये मुफ्त की दुकान सरकारी स्कूल के बच्चों की होकर रह गई थी दबंगो के बच्चों का तो इस दुकान  पर आना संभव ही नहीं था। कापी  मुफ्त की दुकान पर दस रुपये की वो दूसरी दुकान पर  चालीस रुपये की  जो मौजे यहाँ बारह रुपये के वो वहाँ पिचहत्तर रुपये का मिल रहा था। ब्रजकिशोर जी दो सौ रुपये में बच्चों के  लिए  लाए थे वे  प्राईवेट स्कूल में आठ सौ रुपये  में मिल रही थी जो मुफ्त  में ब्रजकिशोर  जी    बच्चों को दे रहे  थे। सरकारी स्कूल के बच्चे भी अच्छे साफ सुथरे होकर  स्कूल आ रहे थे। इसका खामियाजा ब्रजकिशोर जी को भुगतना पड़ता था। वे दलित के द्वारा दी झोपड़ी में किराये  से रहते थे दबंगों  उन्हें  पक्के मकान में नहीं रहने देते थे बकरी का दूध  लेना उनकी मजबूरी थी  । कोई दब॔ग उनसे वास्ता नहीं रखता था। जिसकी ब्रजकिशोर जी परवाह भी नहीं करते थे। उन्हें  तो अब बस काम पर  ध्यान रखना था।जो वे रख रहे थे।जिस के परिणाम भी  अच्छे आ  रहे थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप  


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