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कहानी: आखिर अपनाना ही पड़ा

राम शरण आज भले ही काफी धन संपन्न हों परंतु  उनका बचपन अभावों में रहकर गुजरा बारह साल की उम्र में उन्हें अपने माता पिता की उपेक्षा का शिकार  होकर घर से भागना पड़ा कई दिनों तक भरपेट खाना नहीं मिला पिता वीरसिंह को जब अपनी गलती का अहसास हुआ  तब तक रामशरण की उम्र पैंतीस वर्ष की हो गई थी और पिताजी के जीवन का अंत करीब आ गया था।
आज रामशरण फाईव स्टार होटल रिसोर्ट  वाटर पार्क और डिज्नी लैंड के मालिक हैं  शहर में एक बड़ामॉल भी उनका है लेकिन एक वक्त वो भी था जब उनके खाने के भी लाले पड़े हुए थे।
जब वे बहुत ज्यादा छोटे थे तब का तो उन्हें होश नहीं है लेकिन जबसे उन्होंने होश सँभाला था तबसे ही माता पिता की प्रताड़ना के शिकार होते रहे थे । जबकि रामशरण का छोटा भाई देवीशरण  बहन सुरेखा माँ बाप के खूब चहेते थे। उनके बड़े से  बड़े गुनाह भी क्षम्य थे पर रामशरण जी को छोटी गलती की भी बड़ी सजा मिलती थी। पिता वीरसिंह की नफ़रत  का एक बड़ा कारण यह भी था कि रामशरण का जन्म उनकी  शादी के सात भाह बाद ही हो गया था। हाँलाँकि कई सतमासा संतान भी जन्म लेती हैं पर वीरसिंह रामशरण को अपनी संतान ही नहीं मानते थे इस बात को लेकर वीरसिंह की अपनी पत्नी सुषमा से कई बार तीखी बहस हो चुकी थी सुषमा का रामशरण से गुस्सा होने का सबसे बड़ा कारण भी यही था इसलिए वो भी रामशरण को दुश्मन की नजर से देखती थी ।रामशरण के छोटे बाई देवीशरण के जन्म लेने के बाद  रामशरण की हालत और भी खराब हो गई थी सुषमा की ममता भी उनसे छिन गई थी उसपर देवीशरण का कब्जा हो गया था फिर जब सुरेखा का जन्म हुआ तो वीरसिंह को रामशरण दुश्मन लगने लगा रामशरण स्कूल जाने लगे थे लेकिन उनके पिता उनकी पढाई के दुश्मन थे कई कई दिनों तक रामशरण को स्कूल नहीं जाने देते थे। आठ वर्ष की उम्र से ही उनपर पशुओं की देखरेख की जिम्मेदारी डाल दी गई थी। सुषमा अपने दोनों बच्चों  में रमी हुई थी। वीरसिंह का मन इतने अत्याचार से भी नहीं भरता था वे परेशान करने के नऍए नए तरीके अपनाते थे।  रामशरण बारह वर्ष के हो गए थे वीरसिंह ने उनकी पढाई छुड़वा दी सुरेखा और देवीशरण वीरसिंह से झूठी चुगली कर उन्हें रोज ही पिटवाते थे। हद तो तब हो गई जब उनके पिता वीरसिंह ने मौका देखकर खेत में बने कुएँ में रामशरण  को धोखे से धक्का दे दिया।
और वहाँ से घर आ गए  वीरसिंह को यह मालूभ नहीं था कि रामशरण तैरना भी जानता है। रामशरण तैरकर  कुएँ से बाहर आ चुके थे। अब राम शरण ने सोच लिया?था कि अगर जान बचाना है तो हमेशा के लिए घर छोड़ना  पड़ेगा रामशरण घर न जाते   हुए  शहर की तरफ पैदल ही चल दिए। उनके पिता ने उनको ढूँढ़ने के बिल्कुल भी प्रयास नहीं किए   शहर में रामशरण कई दिन भूखे रहे। फिर वे सामने वाले ढाबे पर  थोड़ा बहुत छोटा मोटा काम  करने?लगे थे  इसके बदले में उन्हें बचा खुचा बासी खाना  मिलने लगा था। धीरे धीरे  रामशरण ढाबे में ही काम करने लगे थे। ढाबे में काम करते हुए राम शरण को पंद्रह वर्ष हो गए थे एक बार उनके ढाबे के सामने महिन्द्रा की जीप आकर रुकी  उसमें  उन्हीं के गाँव के लोग थे उसमें उनके बचपन के दोस्त उमाकाँत ने  उन्हें पहचान लिया बाकी सब भी उन्हें पहचान गए  अब रामशरण उस ढाबे के नौकर नहीं मालिक थे ढाबे के पहले वाले मालिक ने शहर में बड़ा रेस्टोरेंट खोल लिया था तथा ये ढाबा रामशरण को सौंप दिया था जिसे बाद में  रामशरण ने खरीद लिया था। बात जब गाँव की चली तो पता लगा की उनका छोटाभाई इस दुनिया में जिंदा नहीं है वो अंधाधुंध मोटर सायकिल चलाता था डिवाइडर से टकरा  कर उसकी मौत हो गई थी 
बहन की मौत तब हो गई जब वो कुएँ में पानी भरने गई वहाँ उसे चक्कर आ गए  और कुएँ में गिर पड़ी वो तैरना नहीं जनती थी इसलिए उसकी मौत हो गुई थी। रामशरण के पिता वीरसिंह भी डाइबिटीज एवं हार्ट के मरीज हो गए थे। सबको अपनी अपनी करनी का दंड मिल रहा था रामशरण की माँ सुषमा अंधी हो गई थीं। अब वो घर खाने दौड़ता था। वे लोग ढाबे से गाँव चले गए इसके तीसरे दिन वे रामशरण जी के पिताजी को लेकर  ढाबे पर आ गए पिताजी रामशरण को देखकर रोने लगे तथा घर चलने का आग्रह करने लगे तो रामशरण ने एक शर्त रख दी कि मैं आपका और मेरा डी एन ए परीक्षण कराऊँगा उसमें अगर मैं आपका पुत्र हुआ तो ही हक जताऊँगा वरना अपने कर्तव्य निभाऊँगा डी एन ए की रिपोर्ट आने के बाद वीरसिंह के पछतावे का ठिकाना नहीं रहा डी एन ए की रिपोर्ट ने साबित कर दिया था कि रामशरण वीर सिंह के ही पुत्र हैं। पहली बार वीरसिंह ने रामशरण को अपने गले लगाया बोले बेटा हमने तुम्हारे साथ वो किया जो कोई सौतेले के साथ भी नहीं करेगा मैंने तो तुझे मौत के मुँह में तक धकेल दिया था मुझसे बड़ा पापी दुनिया में और कौन होगा। वीरसिंह जी की बीस एकड़ जमीन थी जो हाइवे गुजरने के बाद बेशकीमती हो गई थी वो जमीन पूरी वीरसिंह ने रामशरण जी के नाम कर दी रामशरण की पत्नी सिया को सुषमा ने अपने जेवर दे दिए  अपने पोते नीरज तथा पौती नैनसी को भी  बहुत से उपहार दिए  अब वीरसिंह निश्चिंत हो गए थे बोले बेटा मैं अच्छी तरह जी तो नहीं सका पर तूने मेरी मौत आसान कर दी है । रामशरण ने उस बीस एकड़ जमीन पर लोन लेकर रिसोर्ट वाटर पार्क  तथा डिज्नीलैंड बना लिया था रामशरण का कारोबार खूब फैल गया था वीर सिंह ने जब अंतिम साँस ली तब उनकी उम्र पिच्यासी वर्ष की हो गई थी वे भरापूरा संपन्न और खुशहाल परिवार छोड़कर गए थे इसका संतोष उनके मृत चेहरे पर भी साफ नजर आ रहा था वीर सिंह के निधन के छः माह बाद सुषमा भी दुनिया छोड़कर चली गई थी।  रामशरण जी ने अपने माता पिता के नाम से एक वेलफेयर संस्था बनाई थी जिसके भाध्यम से वे अनेक जनकल्याणकारी काम कर रहे थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप


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