सौम्य,स्वभाव के सौभाग्यमल चौथी बार गाँव जमोनिया के सरपंच चुने गए थे आज उनका भव्य जुलूस निकला था। इस बार मुकाबला बहुत कड़ा था। शुरू में सबको उनकी हार नजर आ रही थी मगर बाद में समीकरण उलट गए और उन्होंने भारी बहूमत से इस बार फिर जीत हासिल कर ली थी। हारा हुआ प्रत्याशी दिलीप सिंह मुँह की खाए बैठा था उसकी चालाकी शातिरता धौंस दपट दादागिरी सब फेल हो गई थी चुनाव में जो रुपया पानी की तरह बहाया था वो भी बेकार हो गया था।
इस बार दिलीपसिंह सौभाग्यमल को बुरी तरह हराने की रणनीति बनाकर चुनाव मैदान में उतरा था। स्थानीय विधायक जिनका क्रिमिनल रिकार्ड था वो दिलीप सिंह का खुलकर समर्थन कर रहे था। उन्होने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर दिलीप सिंह की हर प्रकार से सहायता की थी। जब वोटर लिस्ट तैयार हो रही थी तब संबंधित अधिकारी पर दवाब डालकर दो सौ बाहरी लोगों के नाम सूची में जुड़वा दिए थे। जब वे अधिकारी आनाकानी करने लगे तो दिलीप सिंह ने उन्हें डराया धमकाया जब वे नौकरी पर खतरे की बात करने लगे तो दिलीप सिंह ने विधायक से कहलवाया कि नौकरी की चिंता मत करो नौकरी अगर चली गई तो सहकारी बैंक में नौकरी लगा दूँगा पर तुम्हें वही करना होगा जो हम चाहेंगे। वे दोनों अधिकारी जब वरिष्ठ अधिकारी के पास मार्गदर्शन के लिए गए तो उन्होंने भी दिलीपसिंह का पक्ष लिया। हारकर उन्होंने वे दो सौ नाम जोड़ दिए। वो तो अंतिम तिथि निकल गई थी नहीं तो बाद में दिलीपसिंह और दो सौ नाम जोड़ने की लिस्ट लेकर आये था। वोटर लिसूट का प्रकाशन हुआ उसमें वे दो सौ नाम जुड़े हुए आए थे।
चुनाव प्रचार जोरों से चला था दो सौ वोट तो दिलीपसिंह के पक्के थे ही चार सौ वोट सौभाग्यभल की विरोधी जाति वालों के थे दो सौ वोट दीगर समाज के थे सौभाग्यमल की जाति के पाँच सौ वोट थे। आठ सौ वोट पर,दिलीपसिंह का पलड़ा भारी था जबकि सौभाग्यमल जी के पाँच सौ वोट ही हो रहे थे। पर सौभाग्यमल सबके चहेते नेता,थे उनकी बेदाग छवि थी उनके पास पचपन एकड़ जमीन थी अपार धन संपत्ति थी। गाँव के अधिकाँश लोग उनके अहसानों तले दबे हुए थे। सौभाग्यमल की जाति गाँव की सबसे संपन्न जाति थी गाँव के अस्सी प्रतिशत संसाधनों पर उनका कब्जा था। मतदान की तिथि नजदीक आती जा रही थी। मतदान के ठीक पहले सौभाग्यमल और,उनके समर्थकों ने हर घर में जाकर कहा कि अगर आप हमें वोट देंगे तो हम आपका अब तक का ब्याज और कर्ज माफ कर देंगे। इसका अच्छा असर पड़ा गाँव में ऐसा कोई घर नहीं था जिसने कर्ज न लिया हो उन सबको कर्ज मुक्ति का आश्वासन बहुत अच्छा लगा था। चुनाव के बाद जब मतगणना हुई तो दिलीपसिंह को
मात्र दो सौ तिरेपन वोट मिले थे । जबकि सौभाग्यमल को नौ सौ अड़तालीस वोट मिले थे। अपनी हार से दिलीप बुरी तरह बौखला गया था उसने गुंडों की पूरी फौज बुला रक्खी थी जिनकी खातिरदारी वो पिछले तीन दिनों से कर रहा था। जब वो उन्हें बुलाने गया तो पता चला कि उन्हें कोई भरमाकर ले गया था कहाँ ले गया इसका कोई पता नहीं चला था दिलीप अब गाँव में अकेला पड़ गया था। चौक पर उसे गाँव के पचास प्रभावशाली लोगों ने घेर लिया था तथा कहा था बस बहुत हो चुकी तेरी दबंगई अब अगर कुछ भी ऐसी वैसी हरकत की न तो इस गाँव का रस्ता तेरे लिए हमेशा के लिए बंद हो जाएगा। ये गाँव अभी तक भले लोगों के गाँव के नाम से जाना जाता रहा है तू क्या चाहता है कि गाँव की शाँति भंग हो जाए लोग आपस में लड़ें और गाँव बदनाम हो बोल क्या चाहता है? अगर तू अपने स्थान पर गाँव के सज्जन ओंकार दादा का समर्थन करता तो हम सब तेरा साथ देते। सौभाग्यमल तो नामाकन पर्चा ही दाखिल नहीं करते।लेकिन तेरे जैसे गिरे इंसान का सरपंच बनना किसी के भी हित में नहीं था इसलिए तेरी हार हुई है। दिलीपसिंह वक्त की नजाकत देखकर पलटी मार गया था उसने गिड़गिड़ाकर उनकी हर बात मान ली थी । इसके बाद ही आज सरपंच सौभाग्यमल जी की जीत का जुलूस निकला था ।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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