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व्यंग्य : अपमान के घूँट

मज़बूरी इंसान को इतना झुका देती है कि उसे अपने जीवन से नफ़रत होने लगती है। या फिर एसा व्यक्ति अपमान के कड़वे घूँट पीने का आदि हो जाता है विशेष कर कमजोर,तबके के लोग जो अत्यंत गरीबी में जीवन यापन कर रसे हैं जिन्हें दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो रहा हो वो अपमान का कड़वा घूँट पी जाते हैं। कुछ जिम्मेदारियों के बोझ के तले दबे होते हैं वे भी अपमान को सहकर हँसते रहते हैं इसके अलावा और वे कर ही क्या सकते हैं।
राकेश के पास लोडिंग ऑटो था। जिससे उसे अचछी खासी आय हो जाती थी परिवार की गुजर बसर आराम से चल रही थी । तभी राकेश बीमार हो गया पहले उसे टाइफाइड हुआ फिर पीलिया भी हो गया तीन महीने वो काम पर नहीं जा सका बीमारी के इलाज में उसका लोडिंग ऑटो भी बिक गया था। लेकिन सवाल पेट का था। गृहस्थी की जिम्मेदारी थी तभी किसी ने कहा कि बाबूलाल सेठ को कार के लिए ड्राइवर चाहिए। राकेश ने पन्द्रह हजार रुपये के वेतन पर वो नौकरी कर ली। साबूलाल जी का बर्ताव तो ठीक था बाकी उनके घर में सभी बददिमाग थे। उसने नौकरी तो ज्वाइन कर ली थी। पर इसके बदलें में उसे रोज अपमेन के घूँट पीना पड़ते थे। नौकरी छोड़ नहीं सकता था। यह बात बाबूलाल का परिवार भी जानता था इसलिए वो उसे रोज अपमानित करते थे। और वो हँसकर अपना अपमान सहन कर लेता था लोडिंग आटो खरीदना तो उसे सपना लगता था। उसने अपमान को सहना सीख लिया था और यही समय,की माँग धी। क्योंकि उनकी सेलरी परिवार का आर्थिक सहारा बनी हुई थी। बाबूलाल जी कभी कभार उसे सांत्वना दे देते थे। बीच बीच में थोड़े से रुपये दे देते थे।जिन्हें पाकर वो ऐसे खुश होता था जैसे उसकी लॉटरी लग गॡ हो। 

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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