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व्यंग्य : मुझसा बुरा न कोय

अक्सर यह देखा जाता है कि जो लोग बुरे होते हैं वे सबको बुरा समझते हैं उनको किसी में कोई अच्छाई नज़र नहीं आती ऐसे लोग ज्यादातर,तनाव में रहते हैं उनको कभी को ई अच्छे मूड में नही देखता ज़माने भर की शिकायतों का इनके पास पुलिन्दा रहता है । इनके मुँह से कभी की तारीफ़ के दो बोल तक नहीं निकलते जैसा छल कपट छल,छिद्र,धोखा इनकी नस नस में भरा होता है वैसा यह सबमें समझते हैं।
यह लोग अहसानफ्रामोश भी होते हैं कोई इनके लिए अपनी जान भी दाँव पर लगा दे तब भी यह उसका अहसान नहीं मानते यह मतलब से वास्ता रखते हैं मतलब निकलने पर बिना आभार के यह उससे कोई वास्ता नहीं रखते इनका साथ वो कहावतें पूरी तरह सही होती हैं जैसा करोगे वैसा भरोगे । करनी का फल तो भुगतना ही पड़ेगा जो लोग किसी के प्रति निष्ठा नहीं रखते उन पर कौन निष्ठा रखेगा।
राकेश ऐसा ही इंसान था उससे उसके किसी परिचित ने कहा कि उसे मकान खरीदना है कोई बेचने वाला हो तो बताना। यह सुनते ही राकेश की आँखों में चमक आ गई उसने इसमें मोटी रकम वसूलने का मन बनाया। जबकि उस व्यक्ति ने इस पर बहुत अहसान किए थे पर राकेश सब कुछ भूल चुका था । अठ्ठाइस लाख का मकान उसने चौंतीस लाख में उसको बिकवा दिया और छः लाख की मोटी रकम बीच में हड़प ली इसके बाद उल्टा उसपर अहसान जताते हुए कहा कि चालीस लाख का मकान मैंने तुम्हें चौंतीस लाख में दिलवाया है। मुझे कुछ तो मिलना चाहिए ऐसा कहकर उससे चालीस हज़ार रुपये और हड़प लिए। इसके बाद भी उसका मन नहीं भरा । राकेश वो शख्स था जिस पर उसके शिताजी तक विश्वास नहीं करते थे एक बार उन्होंने अपनी दवाएँ उससे मँगवाई थीं दो सौ रुपये की दवाएँ उसने चार सौ में लाकर दी थीं दो सौ रुपये कमीशन उसने अपने पिता से भी हड़प लिया था इसके बाद उसके पिताजी ने कभी उससे कोई सामान नहीं मँगवाया था। एक बार उसके पिताजी ने चार हजार रुपये मकान के बिजली का बिल जमा करने के दिए उस मकान के जिसमें राकेश खुद रह रहा था। राकेश ने वो बिल जमा ही नहीं किया पूरा पैसा हड़प लिया। जब बिजली कटी तब पिताजी को पता चला कि पैसे तो राकेश ने हड़प लिए हैं। उन्होंने किसी से उधार लेकर बिल जमा किया उनका रहा सहा विश्वास भी उठ गया था पर राकेश को इसकी परवाह नहीं थी यह सब तो उसकी फितरत थी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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