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व्यंग्य : अपनों की लूट

एक बुजुर्ग व्यक्ति कह रहे थे कि अपनी जीवन भर की कमाई को कौन लूटता है? फिर ख़ुद ही बोले सबसे पहले लुटेरे तो अपने वाले ही होते हैं जो बुढ़ापे में तुमसे तुम्हारी दुकान छीन लेते हैं। जमीन छीन लेते हैं मकान पर कब्जा कर लेते हैं इमोशनल ब्लेकमेल करके रकम जेवरात हथिया लेते हैं । पेंशनर की पैंशन छीन लेते हैं उसके लिए आपस में लड़ते हैं।
ऐसा ही एक मामला एस डी एम साहब की कचहरी में पेश हुआ जिसमें बेटे बहू ने माँ की आठ एकड़ जमीन हथिया ली थी पूरा मकान हड़प लिया था माँ के लिए एक छोटी कोठरी छोड़ी थी उससे भी उसे बेदखल,करने की तैयारी चल रही थी। माँ को वो खाना भी नहीं देते थे माँ भीख माँगकर अपना पेट भर,रही थी और उसकी जमीन पर मौज करने वाले बहू बेटे पोते पोती पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। वे भाव शून्य संवेदना शून्य बने हुए थे किसी ने इसकी शिकायत एस डी एम साहब से कर दी तब उन्होंने पन्द्रह सौ रुपये की रेशि भरण पोषण के लिए बेटे से दिलवाने का निर्णय पारित किया। यह तो वो बात है जो सामने आ गई पर बहुत से मामले दबे हुए हैं किसी ने अपने ही घर में चोरी कर के बूढ़ी माँ के जेवर चुरा लिए हैं। एक बहू बेटे ने तो अपनी माँ को चौथी मंजिल से धक्का देकर बेरहमी से मार डाला फिर भी माँ ने मरते मरते बेटे बहू के खिलाफ ब्यान नहीं दिया और उन्हें बचा लिया इसके बाद भी उन्होंने बेरहमी से अपने पिता को घर से बाहर निकाल दिया अब वो बहू बेटे अपने बच्चों के सहित सुख पूर्वक रह रहे हैं। और बाप बेचारा बुढ़ापे में दर दर की ठोकरें खा रहा है। और सोच रहा है जिनकी बेहतरी के लिए जीवन भर खटा उन्होंने ही बुढ़ापा ख़राब कर दिया।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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