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व्यंग्य : पीठ फेरते ही बुराई करने वाले

 कुछ,लोग की बोली में जितनी मिठास होती है उससे अधिक उनके मन में कड़वाहट भरी रहती है अगर किसी के सामने उसकी जब जी खोलकर ख़ूब तारीफ करते हैं तो वो यही समझता है कि इनसे बड़ा और कोई शुभचिंतक हो ही नहीं सकता ।
लेकिन ऐसे लोग पीठ फंरते ही कड़वा मुँह बनाकर,ऐसी बुराई करते हैं कि अगर वो सुन ले तो उसके तन बदन में आग लग जाए। यह सामने बुराई करने की हिम्मत नहीं कर सकते ।
एक ऑफिस में निरीक्षण के समय छोटे साहब बड़े साहब अपनी अधीनस्थ मेडम रंजना की खूब बुराई कर रहे थे। बड़े साहब यही समझ रहे थे कि इनके बीच में मन मुटाव होगा। वे बुराई करते हुए थक भी नहीं रहे थे बड़े साहब के सामने उन्होंने मेडम को नकारा बददिमाग और,लापरवाह घोषित कर दिया तभी अचानक रंजना मेडम आ गई उन्हें देखकर वे पहले तो सकपका गए फिर उन्होंने रंग बदलने में गिरगिट को भी मात दे दी। अब वे रंजना मेडम की तारीफों के पुल बाँध रहे थे बड़े साहब उनको इतनी जल्दी पलटी मारते हुए देखकर चकित थे। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कोई इतनी जल्दी रंग भी बदल सकता है। ऐसे लोग कभी किसी के काम से संतुष्ट नहीं होते पर सामने अपने असंतोष को कभी जाहिन नहीं करता। यह किसी से दिल से प्रेम नही करते जिनसे इनका मतलब नहीं होता उसकी तरफ देखते भी नहीं। जिनसे इन्का मतलब होता है उसकी खुशामद में ये कोई कसर नहीं छोड़ते। यह झूठो तारीफ सामने से करते हैं तो पीठ फेरते हो झूठी बुराई करने में जरा भी नहीं हिचकिचाबनते नका शायद ही कोई पक्का दोस्त होता होगा। यह भी किसी के सच्चे दोस्त नही॔ करते। जोइनकी आदत से परिचित होते हैं। वे कभी धोखा नही खाते वे हमेशा इनसे सँभल कर रहता है। इनके रिश्तों में कभी गरमाहट नहीं आती क्योंकि यह रिश्ते स्वार्थ पर टिके होते है।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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