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व्यंग्य: संघर्ष के मज़े

कहते हैं कि सफलता बिना संघर्ष के नहीं मिलती अगर बिना संघर्ष के सफलता मिलती होती तो उसे पाने में कोई आनंद ही नहीं होता यह संघर्ष ही हमे मजबूत बनाता है। यदि सर्कस के शेर को जंगल में छोड़ दिया जाए तो वो भूख से मर जाएगा क्योंकि पिंजरे में बंद रहकर,वो शिकार करना भूल गया है उसे शिकार करना नहीं आता क्योंकि उसे समय पर तैयार भोजन बिना शिकार किए ही मिलता रहा है और,इसका वो आदि हो चुका है।
इसी तरह जो संघर्ष से सफलता पाते हैं। उनकी बात ही निराली होती है उनका व्यक्तित्व पूरी तरह संतुलित होता है वे जुझारू स्वभाव के साहसी होते हैं जो हर मुसीबत को पार करने भें सक्षम होते हैं। देखने में सुविधा भोगी संपन्न लोग बड़े अच्छे लगते हैं लोग उन्हें ख़ुश किस्मत वाला समझते हैं। पर जो घोर परिश्रम करके खूब भूख लगने पर खाना खाता है । उसे जो तृप्ति मिलती है। वो आराम तलब आदमी को मेवा मिष्ठान्न चा भोडन करने पर भी नहीं मिलती।
खेतिहर मजदूर कुंजीलाल का लड़का किशन और जमींदार का लड़का रूपेश दोनो हम उम्र थे दोनों सेना में जाना चाहते थे। रूपेश ने इसके लिए कोचिंग की थी और,किशन के पिताजी उसे बारिश में चार महीने के लिए अपने पशुओं के साथ सौ किलोमीटर दूर घोर जंगल में ले आए थे सामने पहाड़ था नीचे जंगल वहीं उन्होंने झोपड़ी बनाकर रहना शुरू किया। पूरे चार महीने किशन ने जीने के लिए कठिन संझर्ष किया जिससै वो बलिष्ठ तथा मजबूत हो गया। बारिश के बाद दोनों सेना में भर्ती होने के लिए गए जिसमें रूपेश अयोग्य होने के कारण चयन से बाहर कर दिया गया और किशन का चयन हो गया। यह उसके कठोर जीवन संघर्ष का परिणाम था इसी से वह सेना का कठिन प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा कर सका। इसिलिए तो संघर्ष के बाद मिली हुई सफलता के आनंद,का वर्णन नहीं किया जा सकता।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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