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व्यंग्य : परीक्षाएँ

परीक्षाएँ सिर्फ विद्यार्थी जीवन में ही नहीं होतीं इसके बाद भी परीक्षाएँ चलती रहतीं हैं जिनमें कुछ में तो वो पास हो जाता है और कुछ में फेल इसी आधार पर उसकी सफलताएँ असफलताएँ निर्धारित होती है।
बहुत से ऐसे हैं जो परीक्षाओं से बचकर रहना चाहते हैं यह सोचकर वे न तो कोई परीक्षा देना चाहते हैं और न ही उनकी तैयारी करते हैं इसलिए उनके परिणाम उन पर असरकारी नहीं होते।
यह तो सभी जानते हैं कि कोई परीक्षा आसान नहीं होती प्रायः सभी परीक्षाएँ कठिन होती हैं। उनके अच्छे परिणाण जितने आनंद दायक होते हैं उससे ज्यादा तनाव भरा परीक्षा का वक्त होता है और उसकी तेयारी में हमें अपने सुखों का त्याग करना पड़ता है।
आशुतोष और,आशीष दोनों सगे भाई थे आशुतोष बड़ा 
और आशीष छोटा आशुतोष पढ़ाई में तेज था आशीष फिसड्डी । आशुतोष टॉपर रहता तो आशीष जैसे तैसे पास हो जाता था। फिर भी आशीष माता पिता का चहेता था माँ उसे अपने से अलग नहीं करना चाहती थी आशुतोष ने आठवीं की परीक्षा मेरिट के साथ पास की थी हायर सेकेण्डरी स्कूल बीस किलोमीटर दूर था। वहाँ एडमीशन लेना कमरा किराये से लेना हाथ से खाना बनाना घर से अकेले रहना किसी बड़ी परीक्षा से कम नहीं था। आशुतोष को मेरिट छात्रवृत्ति मिलने लगी थी उसी से उसने अपना खर्च निकालना शुरू कर दिया था । आठ वर्ष की अनेक कठिन परीक्षाओं मे सफलता प्राप्त करते हुए बाइस वर्ष की उम्र में उसका चयन आइ ए एस के लिए हो गया था उसके गाँव की यह पहली उपलब्धि थी पूरा गाँव इसकी खुशी मना रहा था जबकि आशीष ने तो आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी तथा पिताजी की चार एकड़ जमीन पर खेती कर,आर्थिक संकट और कर्ज में डूबकर,अपना जीवन यापन कर रहा था। दूसरी और आशुतोष एक कामयाब इंसान बनकर शानदार जिंदगी जी रहा था। उसका सबसे बड़ा कारण यही था कि उसने हर परीक्षा चा पूरी तैयारी के साथ सामना किया था तथा सफलता हासिल की थी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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