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व्यंग्य : क्रोध किया ही क्यों

अक्सर क्रोध के कारण जो अपना काम बिगाड़ लेते हैं । बाद में उन्हें ख़ूब पछतावा होता है । तब वे सोचते हैं आखिर उन्होंने क्रोध किया ही क्यों शाँत रहकर भी तो बात की जा सकती थी । तब काम बिगड़ने की नौबत ही नहीं आती।
क्रोध करने वाला अपनी आदत से मज़बूर होता है वो दूसरों का पक्ष सुनना ही पसंद नहीं करता उसकी निगाह में उसको छोड़ कर सब गलत होते हैं। 
रवि अपने गुस्सैल स्वभाव से खुद ही परेशान था। गुस्से में वो किसी का लिहाज नहीं करता था। खूब जली कटी सुनाए बिना उसे चैन नहीं पड़ता था। एक साल में तीन बार उसे किराये का मकान बदलना पड़ता था तीन महीने से ज्यादा उसकी किसी मकान मालिक से नहीं निभती थी। आखिर लड़ाई हो ही जाती थी। जिसके नतीजे में उसे मकान खाली करना पड़ता था। पन्द्ह साल में दस जगह वो नौकरी कर चुका था कोई उसकी बात अधिक समय तक बर्दाश्त नहीं कर पाता था । ऐसे लोग बार बार ठोकर खाते हैं । इनका गुस्सा बुरा ही हुआ करताहै इस बात को अच्छी तरह जानते हुए भो यह गुस्सा करने से कभी बाज नहीं आते। आत्म सम्मान सबका होता है कोई अपना अपमान सार्वजनिक रूप से सहन नहीं कर सकता। ऐसे लोग जब क्रोध में किसी को अपमानित करते है। वो हमेशा के लिए संबंध गँवा देते हैं। फिर भी क्रोध करना उन्हें अच्छा लगता है । नतीजे इसके चाहे कितने ही बुरे क्यों न निकले वे इसको भी सहन करने का मन बना लेते हैं। पर क्रोध करना नहीं छोड़ते। जो ऐसे लोगों के शुभ चिंतच होते हैं वे इस बात का पूरा ख्याल रखते हैं कि इनको क्रोध करने का अवसर हो नहीं मिले। जब यह दुकान दार से झजड़ा कर लेते हैं तो दुकानदार इन्हें सामान देने से ही इंकार कर देता है। 


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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