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व्यंग्य : दिखावे की भलाई

वैसे तो जो स्वभाव से भले होते हैं वे हर हाल में भले बने रहते हैं लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं । जिनके अंदर छल कपट कूट कूट कर भरा होता है जो हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं मगर भलाई का दिखावा करने में सबसे आगू रहते हैं जहाँ उनका स्वार्थ हल करना होता है वहाँ ये शराफ़त की हद तक पार कर देते हैं । सामने वाले को जब तक पटकनी नहीं मिलती तब तक वो उन्हें दुनिया का सबसे भला इंसान समझता रहता है।
जो लोग इनकी फितरत को जान जाते हैं । वो इन के फायदे की बात करके इनसे धन ऐंठते हैं फिर उसके अनुसार वे उन्हें लाभ भी पहुँचाते हैं जिसे देखकर उन्हें संतुष्टि मिलती है।
एक ग्रामीण स्तर के कर्मचारी थे उन्हें अपना प्रमोशन लेना था उन्होंने साहब की निगाह में भले बनने के हर हथकण्डे अपनाना शुरू कर,दिए । साहब को पाँच हजार वर्ग फीट का भूखण्ड फार्म हाऊस के लिए खरीधना साहब उसके लिए पचास ,लाख रुपये देने को तैयार थे इन्होंने उन्हें दस हजार वर्ग फीट का भूखण्ड साठ लाख में दिलवा दिया तथा दस लाख रुपये की दलाली भी खा ली। साहब को इसकी भनक भी नहीं लग पाई साहब की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था साहब के मित्र सी एम ओ साहब थे। उनको खुश करने के लिए उन्होंने अपने गाँव में नसबंदी शिविर लगवाया। उसमें बड़े नेताओं को आमंत्रित किया व्यवस्था खूब शानदार की शिविर का आयोजन सफल रहा था साहब भी खुश थे सी एम ओ साहब भी खुश थे आयोजन के दौरान उन्होंने ग्राम के सरपंच के हाथ में नोटों से भरा एक लिफाफा दिया जिसमें ग्यारह हज़ार रुपये थे सरपंज जी से कहा कि ये लिफाफा आप पुरूस्कार के रूप में अपनी तरफ से मुझे देना तथा मेरी खूब तारीफ करना उनकी यह तिकड़म काम कर गई साहब उनके प्रशंषक बन चुके थे। जिसका ईनाम उन्हैं प्रमोशन के रूप में मिला इस तरह वे अपने मकसद में कामयाब हो गए थे।


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रचनाकार 
प्रदीप कश्यप

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