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व्यंग्य : खुली लूट

जबसे उच्च स्तर के कुछ विशिष्टों ने आम जनता के साथ खुली लूटा का मुद्दा उठाया है तबसे सोशल मीडिया पर यह सबसे बड़ी चर्चा का विषय भन जया है जिसमें सबसे ज्यादा पीड़ित आम आदमी मुखर नजर आ रहा है बाकी अधिकाँश विशिष्ट लोग इस पर चुपूपी साथकर बैठे हुए हैं सोशल मीडिया चर यह भी चल रहा है कि टोल आम आदमी से ही क्यों वसंला जाए बाकी सभी लोगों से क्यों नहीं सक्षम होते हुए भी उन्हें ये छूट किस कारण से दी जा रही है।
कोई यह भी कह रहा है कि जो करोड़ों के पर्स लाखों का पानी एक कप चाय अथवा कॉफी गटक रहें हैं वो भी दो सौ रुपये रोज की दिहाड़ी करने वाले मजदूर की गाढ़ी कमाई की जेब से निकला हुआ पैसा है।
जो कुछ खास लोगों को करोड़ों रुपये के गिफ्ट दिए गए हैं वो भी आम आदमी के जेब से निकाले गए पैसे हैं। जो वैधानिक रूप से वसूले गए हैं। इसका सबसे बड़ा कारण मोनो पाली है चार कंपनियों के हाथ में पूरा कारोबार है उन्होंने आपस में मिलकर रेट फिक्स कर लिए हैं आम आदमी के पास कोई विकल्प नहीं छोड़ा गया है। ऐसे ही पेनल्टी के नाम से सर्विस चार्ज के नाम से अनाप शनाप रुपये की वसंली भी आम आदमी का कचूमर निकाल रही है। उसके पास कोई विकल्प नहीं है सभी एक जैसा सर्विस चार्ज वसूल रहें हैं उसके कोई निर्धारित मापदण्ड नहीं है न उनसे कोई पूछने वाला है न रोक लगाने वाला। शायद इन्हें बोलने वाले का मुँह बंद करने का कोई तरीका आता हो जिसका यह इस्तेमाल कर रहे हों। 
सब्जी का ठैला लगाने वाले लखन ने बताया कि कैसे सब्जी का भाव निर्धारित होता है। किसान से मंडी में जो टमाटर चार रुपये किलो खरीदे जा रहे हैं वो हम पच्चीस रुपये किलो बेचने को विवश हैं और जो बड़े दुकानदार हैं वो इन्हें चालीस रुपये किलो बेच रहे हैं भाव में दस गुना अंतर है अगर इसमें किसान का हिस्सा साठ प्रतिशत हो तो उसके वारे न्यारे हो जाएँ क्योंकि आम आदमी की जेब पर?तो वैसे ही डाका डाला जा रहा है। लखन ने बताया मंडी में चार आढ़तिए हैं जो किसान से सब्जी खरीदने का भाव तय करते हैं वे ही   
फुटकर व्यापारियों को अपने द्वारा निर्धारित भाव में देते हैं और बिना कुछ किए धरे मोटी रकम हड़प लेते हैं इनकी ऊँची राजनैतिक पहुँच होती है इसलिए इनका कोई कुछ बिगाड़ नहीं पाता। यह सुनकर एक आम आदमी ने हाथ उठाकर सच्चे मन से बददुआ दी देखना एक दिन इन कथित लुटेरों को अपने किए का अंजाम भुगतना होगा। और वो कर भी क्या सकता था उसके अधिकार क्षेत्र में कुछ भी तो नहीं था।



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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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