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व्यंग्य : सफलता के गलत मापदण्ड

जब गलत लोग गलत तरीकों से सफलता हासिल कर लेते हैं और सही लोग सही तरीके से प्रयास करने के बाद भी असफल हो जाते हैं तो ऐसा समाज के लिए अच्छा नहीं होता यह नैतिक रूप से पतनशील समाज की निशानी बन जाता है। जहाँ योग्यता को नकार,दिया जाता हो और,अयोग्य को उसका स्थान दिला दिया जाता है वहाँ के लोग कैसे होंगे उनकी सोच कैसी होगी इस का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
ऐसे अयोग्य लोग योग्य,लोगों को पीछे धकेल कर आगे बढ़ जाते हैं।
एक विभाग में लेखा विभाग के प्रभारी बड़े योग्य और,ईमानदार थे। पर उनके साहब भ्रष्ट थे। उनके कारण वे भ्रष्टाचार नहीं कर पा रहे थे। साहब ने कई झूठे आरोप लगाकर उनकी गोपनीय चरित्रावलि पर प्रतिकूल टीप लिखकर उनका डिमोशन करा दिया और उन्हें लूप होल में पटक दिया। उनके स्थान पर,एक अयोग्य,जो उनके जैसा ही भ्रष्ट था ।की सी आर अच्छी लिखकर उसका प्रमोशन करा दिया । अब वे दोनों मिलकर खुला भ्रष्टाचार कर रहे हैं उनसे लोग परेशान तो हैं पर उनका कोई बाल बाँका करने वाला नहीं है। क्योंकि उनका सुरक्षा कवच भ्रष्टाचार के घेरे से मजबूत है जब योग्य,ईमानदार को हटाया गया तो उसकी पैरवी करने वाला कोई नहीं था उसकी जगह पर भ्रष्ट को लाया गया तो उसको बधाई देने वालों का ताँता लग गया। बुरे लोगों का खूब महिमा मंडन हो रहा है और भले लोगों को अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। । भले लोगों का साथ,देने वाला कोई नहीं । उन्हें नासमझ बतलाया जा रहा है। जरा सोचिए इसका आगे चलकर नतीजा क्या निकलेगा। शायद,या तो समाज पूरी तरह बिगड़ जाए या फिर नैतिक मूल्यों की स्थापना हो जाए क्योंकि देर सबेर हमें भलाई को स्वीकार,करना ही पड़ेगा। तभी हम बेहतर समाज को बनाने में कामयाब हो सकेंगे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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