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व्यंग्य : धुन के पक्के

जो लोग धुन के पक्के होते हैं वे विपरीत परिस्थिति में भी मज़बूती से खड़े रहते हैं। जैसे मोती की तलाश में बहुत से लोग गहरे पानी मे खूब डुबकियाँ लगाएँ पस्त होकर,थक जाएँ उन्हें एक भी मोती नहीं मिले वे हारकर लौट आएँ लेकिन उनमें जो धुन का पक्का है वो अपनी खोज जारी रखे अंततः सफल होकर जब वो मुठ्ठी भर कर मोती लेकर लौटे तो यह उसके धुन के पक्के होने का प्रतिफल है जो उसी को मिला है इस प्रतिफल ने उसकी सारी मेहनत सार्थक कर दी है जबकि जो डाँवाडोल हो गए वे खाली हाथ लौट आए अपनी सारी मेहनत को निष्फल बनाकर।
जो अस्थिर मति के लोग होते हैं वो कोई भी काम ठीक से नहीं करते इसके कारण वो बार बार मुँह की खाते हैं तथा हमेशा परेशानियों से घिरे रहते हैं इनके पास असफल होने के अनेकों कारण होते हैं अंत में यह अपनी किस्मत को दोष देकर शाँत हो जाते हैं फिर इनकी कुछ नया करने की मनोदशा भी नहीं रहती।
राकेश पाँच भाई थे उनके पिताजी के पास दस एकड़ जमीन थी । पाँचों भाइयों की शादी हो गई थी।उनकी माँ के निधन पर,पिताजी ने सन्यास ले लिया था अपनी जमीन पाँचों भाईयों में बराबर बाँट दी थी सबको दो दो एकड़ जमीन मिली थी। राकेश को छोड़कर,चारों भाईयों ने विचार किया कि जब दस एकड़ में पिताजो का चर्च नहीं चलता,था तो दो एकड़ में हमारा क्या होगा चारों भाईयों ने अपने हिससे की जमीन मुनाफे पर,राकःश को सौंप दी । और शहर में आकर स्लम में रहने लगे मेहनत मजदूरी कर,अपना जीवन यापन कनेर,लगे । सभी ने अपनी जमीन धीरे धीरे राकेश को बेच दी राकेश धुन का पूरा पक्का था उसे अपनः पर भरोसा था। दस साल बाद जब चारों भाई भानजी की शादी में गाँव आए तो राकेश की शानो शौकत देखकर,चकरा गए । वेयर हाऊस पेट्रोल पंप मैरिज गार्डन दूध डेरी सब उसी की थी सबसे आलीशान उसकी बिल्डिंग थी चालीस एकड़ जमीन उसके पास थी सैंकड़ों नौकर चाकर उसके यहाँ काम कर रहे थे। वे राकेश की सफलता को पचा नहीं पा रहे थे पर कुछ कर नहीं सकते थे राकेश गाँव का सरपंच था और पत्नी जिला पंचायत की सदस्य उससे उलझन अब इतना आसान नहीं था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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