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व्यंग्य : बेआवाज लाठी

पहले सयाने लोग कहा करते थे मूक पशुओं को अकारण मत सताओ किसी बेबस गरीब का दिल मत दुखाओ उनकी हाय अच्छी नहीं होती वे जो बददुआएँ देते हैं वे असर जरूर करती हैं ऐसा उनका मानना था।
मगर,आजकल के ज्यादा पढ़ लिखे लोगों ने इसे वाहियात मानकर नकार दिया है ये भौतिक वादी लोग जो ईश्वर को भी नहीं मानते ये अहंकारी होकर मनमानी पर,उतर आते हैं । कमजोरों का शोषण करते हैं उनका हक छीनकर खा जाते हैं और ऐशो आराम की जिंदगी बसर करते हैं। यह कोई मेहनत का काम नहीं करते और जो मेहनतकश होते हैं उसे इतनी कम मजूरी देते हैं जिससे वे जीवित रह सकें और काम करने लायक बने रहें। कई बार,यह उनकी मजूरी का भुगतान भी नहीं करते। तब बेबस दुखी लाचार सिवाय बददुआएँ देने के और कुछ कर भी नहीं सकता है। जब ऐसे लोगों का अहंकार,टूटता है जब इन पर भारी विपदा आती है तब यह सताए हुए इंसान इसे कुदरत का दिया गया दंड मानते हैं वे इसे बेआवाज लाठी कहते हैं जिसकी मार तो तगड़ी होती है पर,इसमें आवाज नहीं होती इस लाठी का प्रहार किसने किया कहाँ से किया यह भी पता नहीं चलता है। तब यह सताए हुए लोग यह कहकर संतोष कर,लेते हैं कि इनको अपने किए की सजा मिल गई वे भी उनके अनुमान से कहीं ज्यादा।
इस संबंध में एक घटना याद आती है जिसमें एक आदमी श्वानों से बड़ी शत्रुता रखता था कहीं भी यह उसको दिखाई दे जाएँ तो उन पर पत्थर से प्रहार करता था या लकड़ी फेंक कर मार देता था। और जब वो बेबस दर्द से तडपकर,क्रंदन करता था तो उसे बहुत मजा आता था कुछ लोग उसे ऐसा करने से मना भी करते थे तब भी वो ध्यान नहीं देता था एक बार उसके साथ भयानक दुर्घटना हुई जिसमें उसका वो हाथ चकनाचूर हो गया जिससे वो पत्थर,मारता था और दूसरा पैर भी उसका ऐसे चकनाचूर हुआ कि उसे भी काटना पड़ा आजकल वो बैशाखी के सहारे चलता है श्वान उसको देखकर गुर्राते हैं और वो कुछ कर भी नहीं पाता है। कुछ लोग इसे ही कुदरत की बेआवाज लाठी कहते हैं।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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