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व्यंग्य : फ़ुरसत से परेशान

एक ओर जहाँ लोग काम की अधिकता से हैरान है दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे हैं जो फ़ुरसत से परेशान है उनके पास करने को कोई काम ही नहीं है वे काम करना चाहते हैं पर उनको समझ में ही नही आता कि वे क्या काम करें उनमें से बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो पहले काम के बोझ से लदे हुए थे वे चाहते थे कभी उनके पास भी फुरसत ही फुरसत हो।
जब उन्हें फुरसत मिली तो कुछ दिन तो वे बड़े खुश रहे फिर वो फुरसत उनकी परेशानी का कारण बन गई अब वे काम करना चाहते हैं पर कोई उनसे काम कराना ही नहीं चाहता।
राकेश एक दुकान पर काम करता था वो अपने काम में माहिर था लेकिन उसका व्यवहार सही नहीं था दो और काम करने वाले थे उन्हें वो परेशान करता था। कहता था सारा काम में ही तो करता हं यह दो करते ही क्या हैं। दुकानदार,ने उसे सबक सिखाने के लिए एक दिन कहा आज से राकेश कोई काम नहीं करेगा बस यह दुकान पर,आएगा और चुपचाप बैठा रहेगा इसे बैठे रहने की तनख्वाह मिलेगी राकेश को पहले तो खूब खुशी हुई बाद में वो फुरसत से परेशान हो गया। आखिर उसने काम के लिए मिन्नतें कीं माफ़ी माँगी तब कहीं उसे काम सौंपा गया। ऐसा ही लाभमल जी के साथ हुआ उनकी दुकान ऊनके बेटे नरेन्द्र ने सम्हाल ली अब उनके पास कोई काम नहीं बचा है और,यहो उनची परेशानी का कारण बना हुआ है। वे कभी दुकान पर आ भी जाते हैं तो मूक दर्शक बनकर रहना पड़ता है शुरू में उन्होंने कुछ दखलंदाजी की तो बेटे ने टोक दिया तंग आकर एक दिन कह ही दिया कि अब दुकान पर आपका क्या काम है आप तो घर पर रहकर आराम करो अब आपके आराम करने के दिन है। इस तरह लाभमल जी का दुकान पर आना जाना भी छूट गया है।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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