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व्यंग्य : चने के झाड़ पर चढ़ाने की बात करने वाले

कुछ लोग बड़े चालाक चतुर,चपल होते हैं वे किसी की खूब झूठी तारीफ करके उसे फुलाकर कुप्पा बना देते हैं जिससे वो अपनी औकात भूल जाता है फिर उसे चने के झाड़ पर चढ़ाने की बात करते हैं चने का ऐसा झाड़ तो नहीं मिलता जिस पर कोई आदमी चढ़ सके। लेकिन जो फूल कर,अपनी औकात भूल जाता है वो ऐसा मिटता है जिसका सँभलना मुश्किल हो जाता है।
हाट बाजारों में अगरबत्ती के पैकेट से रुपये निकालने का झाँसा देने के लिए वे ठग अपने आदमी को पैकेट बेचकर मोटी रकम दिदलवा देते हैं उसके धोखे में तमाशबीन अगरबत्ती के पैकेट खरीदते चले जाते हैं लेकिन उन्हें,एक धेला भी नसीब नहीं होता।
किसी को चने के झाड़ पर चढ़ाने की बात करने वाले अपना उल्लू सीधा करने के लिए ऐसा करते हैं। जिसका शिकार बनने वाला बेबस होकर रह जाता है।
दंसरी ओर कुछ लोग ऐसे होते हैं जो मनोबल गिराकर उसकी भविष्य की संभावनाओं पर कुठाराघात करते हैं। यह किसी इंसान की योग्यता और कार्यक्षमता देखकर उससे जलन रखने लगते हैं। ऐसा इंसान अगर कोई स्टार्ट अप शुरू करना चाहे तो यह उसका मनोबल बुरी तरह तोड़कर रख देते हैं जिससे उसकी उन्नति के रास्ते हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं। यह उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाते। जिनका मनोबल मजबूत होता है जिनमें आत्मविश्वास कूट कूट कर भरा होता है जो किसी भी काम को पूरे मनोयोग से करते हैं तथा उसे अंजाम पर पहुँचा कर ही दम लेते हैं। ऐसे लोग ही अपने जीवन में कामयाब होते हैं। और अनेक उपलब्धियाँ उनके नाम होती हैं। 
चाय की दुकान पर काम करने वाले किशोर को उसके मालिक ने बेइज्जत करके दुकान से निकाल दिया । किशोर ने हार नहीं मानी उसने पत्नी के कान के सोने वाले टॉपस बेचकर एक ठेला खरीदा उस पर छोटी चाय की दुकान लगाकर उस दुकान के ठीक सामने खोल ली। किशोर चाय अच्छी बनाता था इसी कारण उस दुकान पर ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी । जब किशोर ने ठेले पर दुकान लगाई तो भीड़ वहाँ उमड़ पड़ी। इसे दुकान मालिच सहन नहीं कर पाया उसने नगर निगम से उसकी दुकान उठवा दी । इससे सबक लेकर किशोर ने सामने वाली दुकान किराये से ले ली तथा वहाँ से चाय बेचना शुरू चर दी। धीर धीरे उसने अपनी होटल पर खाने पीने की सभी चीचें बेचना शुरू कर दीं आज किशोर एक कामयाब होपल वूयवसायी है। और उस दुकानदार को आखिर दुकान बंद करनी पड़ी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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