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व्यंग्य : झगड़े के बाद

जब आपस में खूब गहरी दोस्ती रहती है तब किसी को उनकी भलाई बुराई का पता नहीं चलता इसका पता तो तब चलता है जब उनमें दुश्मनी ठन जाती है इसके बाद,उनका आमना सामना होता है फिर वे आपस में लड़ते हुए एक दूसरे की बुराइयाँ खुलकर बताते हैं,एक दूसरे की पोल पट्टी खोलते हैं तब लोग जान पाते हैं,इनकी असलियत क्या है।
जिनमें दोस्ती गहरी होती है तथा दोस्ती की जड़ें मज़बूत होती हैं । उनमें थोड़ी बहुत नौंक झौंक होती रहती है कभी हल्की फुल्की तकरार भी हो जाती है फिर मान मनौव्वल से दोस्ती और मज़बूत हो जाती है। क्योंकि वे एक दूसरे के हितैषी होते हैं एक दूसरे का भला चाहते हैं इसलिए वे दोस्ती पर कभी आँच नहीं आने देते सबसे अधिक बुरी मतलबी की दोस्ती होती है। ऐसे लोग दोस्ती का हाथ तभी बढ़ाते हैं जब उन्हें अपना मतलब निकालना होता है मतलब निकलते ही ये फिर कभी किसी प्रकार का वास्ता नहीं रखते । कुसुम और सरोज में ऐसी ही दोस्ती थी कुसुम थोड़ी सरल और भावुक थी जबकि सरोज चपल चालाक तथा मतलबी कुसुम भी मेहनत मजदूरी करती थी तथा उसका पति हलवाई था। सरोज ने उसकी खूब चानलूसी कर के उससे गयारह हजार रुपये उधार ले लिए थे कुसुम के लिए ग्यारह हजार,रुपये बड़ी रकम थी जो उसने बड़ी मुश्किल से जोड़े थे तीन साल तक तै कुसुम ने कर्ज वापसी पर,ज्यादा जोर नहीं दिया तीन साल बाद जब अधिक जोर दिया तो वो साफ मुकर गई तथा कर्ज की राशि लौटाने से इन्कार कर दिया दोनों की आपस में खूब लड़ाई हुई उनमें बोलचाल बंद हो गई दिया हुआ पैसा मिलने की तो उम्मीद ही नहीं थी संबंध भी हमेवा के लिए ख़त्म हो गए थे। कुसुम का पति भी उससे कुछ नाराज सा हो गया था क्योंकि वो पैसे उन्होंने पाई पाई करके जोड़े थे वो उन पैसों से हाथ ठेला खरीदना चाहते थे। ताकि वे उसमें अपनी दुकान लगा सकें । इसे वे अब खरीद नहीं सकते थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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