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व्यंग्य : जज्बाती होने की सजा

आज के इस मतलबी संसार में जज्बाती लोगों को अपनी भावुकता की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है कुछ ख़ुदगर्ज अपनी झूठी मज़बूरी का रोना रोकर उनको जज्बाती बना देते हैं फिर अपना मतलब हल कर के अलग हो जाते हैं विशेष कर कर्ज माँगने वाले अपनी मजबूरियों का ऐसा रोना रोते हैं कि सुनने वाले की आँखो में आँसू आ जाएँ।
अपने हाव भाव और अभिनय से जब यह सामने वाले को पूरी तरह प्रभावित कर लेते हैं तब उसे कर्ज माँग लेते हैं भारी भरकम कर्ज लेने के बाद कर्ज अदा करना ही भूल जाते हैं जज्बाती लोग इन्हें बिना ब्याज के कर्ज देते हैं। ऐसे कर्ज को वो कभी अदा नहीं करते । और कभी खूब लड़ाई लड़ के संबंध ही खत्म कर लेते हैं। ऐसे लोगों में निकटतम रिश्तेदार भी शामिल होते हैं। दामाद ससुर सास साली बहनोई बहू कोई भी हो सकता है ये कर्ज लेने के बाद भूल जाते हैं। सामने वाला तकाजा कर कर के हार जाता है और चुप होकर बैठ जाता है। पर कर्जदार को इस पर कुछ असर नहीं पड़ता। किशन लाल की देहात में नौकरी थी वो शहर में आना चाहते थे। उनकी इस कमजोरी का लाभ एक शातिर दिमाज इंसान ने उठाया जो उनका अपना भाई थः। वो किशनलाल से डेढ़ लाख रुपये तबादला कराने के नाम पर ले गया। आठ दिन में ट्रान्सफर आदेश निकलवाने की बात कर के गया था पूरे चार साल हो खए हैं न तो चिशनलाल जी का तबादला हुआ न उन्हें उनके पैसे वापस मिले थे। किशनलालजी कई बार आग्रह कर चुके हैं खूब कहासुनी भी हो गई है। फिर भी वो रुपया लौटाने को तैयार नहीं है। अब तो उसने किशनलाल जी के फोन उठाना भी बंद कर दिया है। किशनलाल जी के पैसे भी गए सम्मान भी खोया। और परेशानी भी दूर नहीं हुई। ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएँगे एक कहावत याद आ रही है रोटी खाना शक्कर से और दुनिया ठगना मक्कर से। ये लोग इसी कहावत को आधार बनाकर चलते हैं । और अपनी चालाकियों पर ख़ूब खुश होते हैं।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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