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व्यंग्य : चापलूसी की कला

आजकल चापलूसी ने भी कला का रूप धारण कर लिया है यह ऐसी कला है जिसके कारम मूर्ख भी विद्वानों के बीच में बैठता है।चापलूसी की चला के जाने बिना किसी का आगे बढना बहुत मुश्किल होता है अगर किसी के पास बड़ा पद नहीं है पैसा नहीं है। प्रभाव नहीं है राजनैतिक पॉवर नहीं है तो फिर वो कितना ही योग्य क्यों न हो वो आगे नही बढ़ पाएगा।
इस चापलूसी की कला से जहाँ अयोग्य भी विद्वानों की श्रेणी में आ गए हैं तथा बिना योग्यता के पी एच डी हथियाए बैठे है। वहीं बिना इसके अनेक प्रतिभाओं का गला घुट चुका है उनकी संभावनाएँ पूरी तरह ख़त्म हो चुकी हैं। उन्हें नकार दिया गया है। और वे भी साधारण जीवन जीने को विवश हैं जो सभी सुख के साधन और सुविधाओं से वंचित हैं। 
एक कार्यक्रम में ऐसे ही एक श्रेष्ठ कवि को किसी भले आदमी के कारण मंच हासिल हो गया जब उसकी बारी आई तो संचालक ने उसको इतना बेइज्जत किया कि वो इस बात पर,अफसोस करने लगा कि वो आखिर यहाँ आया ही क्यों।उसकी खूब हूटिंग कराई उसे कविता चोर तक कह दिया। क्योंकि वो एक आम आदमी था उसके पास कोई बड़ी नौकरी नहीं थी न ही उसे कभी कोई सम्मान मिला था आकाशवाणी दूर दर्शन से भी उसकी रचनाओं का प्रसारण नहीं हुआ था उसे संचालक ने अपनी कविता भी पंरी नहीं कहने दी तथा बीच में ही बैठा दिया उसे ऐसे कोने में जगह मिली जहाँ से वो बड़ी मुश्किल से दिखाई दे रहा था। मंच से उतरने के बाद एक चलते पुर्जे कथित कवि ने उससे कहा तुम कवि तो अच्छे हो लेकिन तुम अपनी कविताओं के साथ कभी न्याय नहीं कर पाओगे अपनी कुछ कविताएँ मुझे देकर,तो देखो मैं उन्हें दुनिया के कोने कोने तक पहुँचा दूँगा बस वो सब मेरे नाम से होंगी लेकिन उस कवि ने उसकी बात नहीं मानी उसने कविता की दुनिया को छोडकर साधारण जीवन जीना स्वीकार कर,लिया । आजकल वो बारह हज़ार रुपये महीने पर किराने की दुकान पर काम कर रहा है।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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