अधिक व्याख्या करने की आवशूयकता नहीं जो थोड़े भी समढदार हैं वो अच्छी तरह से जानते हैं कि सफेद पोश लुटेरे कौन है। जितने भी हैं वे सबसे अधिक प्रभाव शाली है। वे आम आदमी का सब कुछ बिगाड़ सकते हैं पर,आम आदमी उनका बाल बाँका भी नहीं कर सकता।
अखबार में खबर आई कि सरकार ने डी ए डी आर बढ़ा दिया है अभी इसके आदेश भी नहीं हुए हैं कि एक होल सोल एजेन्सी वाले ने अपनी वस्तु के दाम बढ़ा दिए उसने बढ़ाए तो फुठकर वालों ने भी बढ़ा दिए एक आम आदमी ने पूछा कल के भाव में और आज के भाव में ये अंतर कैसा उसने कहा सरकार ने भी तो डी ए डी आर बढ़ा दिया है। आम आदमी ने कहा अभी कहाँ बढ़ाया अभी तो घोषणा की है ।आदेश जारी होने के बाद बढ़ेगा वो बोला हमें इससे कोई मतलब नहीं लेना है तो लो नहीं तो आगे बढ़ो आम आदमी बोला डी ऐ डी आर का लाभ तो सरकारी वेतन भोगियों को मिलेगा मैं तो मजदूर हूँ मेरी मजदूरी थोड़ी बढ़ी है। इस पर,उसने कहा आगे बढ़ो मेरे पास फालतू समय नहीं है। वो आम आदमी हर दुकान पर गया पर सब पर भाव बढ़े हुए थे इसका कारण यही था कि सबका होलसोल डीलर एक ही था उसने भाव बढ़ाए तो सबका भाव बढ़ाना स्वाभाविक था यह आम आदमी के साथ संगठित लूट थो जिस पर,रोक लगाने वाला कोई नहीं था यह तो एक उटाहरण है। ढूँढोगे तो ऐसे लाखों उदाहरण मिल जाएँगे। किसान से दो रुपये किलो प्याज खरीदने वाले बीस रुपये किलो बेच रहे हैं आम आदमी के साथ दस गुना लूट हो रही है किसान कर्ज के दलदल में फँस रहा है। पर सफेद पोश लुटेरों का कोई बाल भी बाँका नहीं कर पा रहा है बात कड़वी जरूर पर,सही है इसका कोई असर पड़ने वाला नहीं है सब इसे जानते हैं फिर भी कोई कुछ भी नहीं कर पा रहा है सब के सब विवश और लाचार हैं।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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