छः भाईयों में सबसे छोटे बैजनाथ चाचा शहर के हायर सेकेण्डरी स्कूल में पिछले बीस वर्षों से कामर्स के व्याख्याता के पद पर कार्यरत थे। बैजनाथ जी बचपन में पोलियो के शिकार हो गए थे तथा एक बैशाखी के सहारे चल लेते थे। बैजनाथ जी ने अपने पाँचों भाईयों के बच्चों को अपने घर में रखकर पढ़ाया लिखाया था और उन्हें कामयाब इंसान बनाया था। उनके कारण गाँव में उनके सभी भाई संपन्न परिवार की श्रेणी में आते थे। सभी भाईयों के गाँव में पक्के मकान थे, जमीन जायदाद थी।
बैजनाथ चाचा ने होमलोन लेकर शहर में अपना मकान बनवाया था जिसमें अपने भाईयों से कोई आर्थिक सहायता नहीं ली थी। बैजनाथ चाचा जब बहुत छोटे थे तब पोलियो से ग्रस्त हो गए थे। गाँव में उनका इलाज ठीक से नहीं हुआ था इसलिए उम्र भर के लिए दिव्यांग हो गए थे पर वे पढ़ने में होशियार थे। बैजनाथ जी के पिताजी उमानाथ जी ने भी उनकी पढ़ाई पर बहुत ध्यान दिया था। उनके बाकी पाँच लड़के आठवीं पास होकर ही रह गए थे। उमानाथ जी के पास नदी किनारे की तीस एकड़ सिंचित जमीन थी जिस पर पाँचों भाई खेती करते थे। उमानाथ जी ने सबको छः-छः एकड़ जमीन बाँट दी थी बस बैजनाथ जी ने जमीन में अपना हिस्सा अपनी खुशी से ही छोड़ दिया था। उमानाथ जी ने बैजनाथ जी को शहर में होस्टल में रखकर उनकी पढ़ाई की व्यवस्था की थी। बैजनाथ जी ने प्रथम श्रेणी में एम कॉम की डिग्री हासिल की थी। इसके बाद वे उसी शहर के सरकारी हायर सेकेण्डरी स्कूल में व्याख्याता बन गए थे। बैजनाथ जी आदर्श शिक्षक सिद्ध हुए थे। वे छात्रों के बीच एक लोकप्रिय शिक्षक के रूप में जाने जाते थे। उनकी पत्नी गौरी एक आदर्श ग्रहणी थी। बैजनाथ जी की दो लड़कियाँ थीं जिन्हें उन्होंने खूब पढ़ाया लिखाया था। उनकी दोनों बेटियाँ कॉलेज में प्रोफेसर थीं। दोनों की शादी हो गई थी और वे अपने पति के साथ बहुत खुश थीं। बैजनाथ चाचा का घर भी होस्टल की तरह ही था। पाँच भाईयों के बच्चे उन्हीं के यहाँ रहकर पढ़ाई कर रहे थे। बैजनाथ चाचा उनकी पढ़ाई का पूरा खर्च उठाते। गौरी चाची को उन बच्चों की देखभाल करने के कारण पूरे दिन फुर्सत नहीं मिलती थी फिर भी उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं आती थी। वे सेवा को ही अपना धर्म मानती थीं। पाँचों भाईयों के पन्द्रह बच्चे बैजनाथ चाचा के घर रहकर ही पढ़े थे। बैजनाथ चाचा के कारण वे सभी अच्छी नौकरी कर रहे थे। उनके सभी भतीजे अक्सर यही कहा करते थे कि उन पर बैजनाथ चाचा के इतने अहसान हैं जिनका बदला वे अपने जीवन में कभी चुका नहीं सकेंगे। और गौरी चाची को तो सभी भतीजे अपनी माँ से भी बढ़कर मानते थे। बैजनाथ जी के पिताजी मरते दम तक यही कहते रहे जिस बैजनाथ के दिव्याँग होने पर उन्हें लगता था कि वो सारी उम्र उनके आश्रित रहेंगे उन्होंने पिताजी की धारणा झुठला दी थी। स्वाभिमान के साथ आत्मनिर्भर रहते हुए अपने भाई भतीजों की मदद की थी तथा जमीन जायदाद में भी कोई हिस्सा नहीं लिया था। फिर भी उनके पास धन की कोई कमी नहीं थी।
*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें