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कहानी: आर्टीजन

मोहनलाल जो दस साल पहले शहर के एक कारखाने में आर्टीजन के पद पर कार्यरत थे वे अब खुद कारखाने के मालिक थे जिसमें दो सौ श्रमिक काम कर रहे थे और जिसका हर माह करोड़ों रुपये का टर्नओवर था। उनकी शहर में अच्छी प्रतिष्ठा थी। वे सत्ताधारी दल के प्रदेश शाखा में पदाधिकारी भी थे तथा नगर पालिका के अध्यक्ष भी रह चुके थे। वे शहर के सबसे बड़े दानदाता थे फिर भी उनके पास कभी धन की कमी नहीं आती थी। उनके कारखाने में कोई श्रमिक ऐसा नहीं था जिसको उन्होंने रहने को आवास नहीं दिया हो। उनके सभी श्रमिकों के पास अपने दो पहिया वाहन थे तथा फोरमेन एवं उससे ऊपर के अधिकारियों के पास कार। आज के दौर में जबकि कई सार्वजनिक उपक्रम घाटे में चल रहे थे तब उनका कारखाना लाभ में चल रहा था।
दस वर्ष पूर्व वे जिस सार्वजनिक क्षेत्र के कारखाने में काम करते थे वो पिछले तीन सालों से बंद पड़ा था। उस कारखाने के बहुत से श्रमिक एवं इंजीनियर अब उनके कारखाने में काम कर रहे थे। जब मोहनलाल जी ने नौकरी छोड़ी तब वे उस कारखाने के सबसे कुशल आर्टीजन थे। वे जिस मशीन को चलाते थे उसकी उन्हें पूरी जानकारी थी। अगर वो मशीन खराब हो जाए तो उसे सुधारने की उनमें क्षमता थी। उनका इंजीनियर श्री निवासन की नौकरी ही मोहनलाल की दम पर चल रही थी। वो जितना मशीन के विषय में नहीं जानता उतना मोहनलाल जानता था। फिर भी श्री निवासन के वेतन में और मोहनलाल के वेतन में जमीन आसमान का अंतर था। मोहनलाल का नौकरी से मन तब भर गया जब उनसे जूनियर और कम योग्य का फोरमेन के पद पर प्रमोशन हो गया और वे प्रमोशन से वंचित हो गए। उन्हैं पता चला कि उनके प्रमोशन नहीं होने देने में श्रीनिवासन का हाथ है। तब उन्हें बहुत दुख हुआ फिर भी वे कारखाने आकर अपना काम करते रहे। कुछ दिन बाद उन्होंने नौकरी छोड़ने का मन बना लिया क्योंकि जिस जूनियर का प्रमोशन हुआ था वो उनका अधिकारी बनकर उन्हें परेशान करता था। वो शुरू से ही कामचोर और निकम्मा था। वो फेक्ट्री से सामान की चोरी करता था जिसे मोहनलाल अपने होते हुए उसे चोरी करने का अवसर नहीं देते थे। वो उन्हें परेशान करने लगा यही नहीं उसने उनकी वेतन वृद्धि रुकवा दी। अनुचित रूप से दो दिन का वेतन कटवा दिया जिसके कारण उन्हें दीवाली का बोनस नहीं मिला। इस साजिश में श्रीनिवासन भी शामिल था। जब पानी सिर से गुजर गया तब मोहनलाल ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने तय कर लिया था चाहे भीख माँगकर गुजारा कर लूँगा पर अब इस कारखाने में काम नहीं करूँगा। मोहनलाल ने वहाँ का काम जैसे ही छोड़ा वैसे ही उन्हें एक निजी फेक्ट्री में काम मिल गया। ये खबर जैसे ही श्रीनिवासन को मिली तो उसने अपने प्रभाव का उपयोग कर मोहनलाल को नौकरी से निकलवा दिया क्योंकि उस फेक्ट्री में तैयार सामान की नब्बे प्रतिशत सप्लाई श्री निवासन के कारखाने में होती थी। श्रीनिवासन ने वो सप्लाई रोक देने की धमकी दी थी जिस से डरकर उस इन्डस्ट्री के मालिक ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया था। मोहनलाल जी ने फिर भी हिम्मत नहीं हारी थी। खाली बैठे हुए उसे एक राजनैतिक की रैलो में दिल्ली जाने का अवसर मिला। वहाँ मोहनलाल जी अपनी नौकरी के सिलसिले में अपने क्षेत्र के सांसद और उद्योग पति रामनाथ से मिले। रामनाथ जी मोहनलाल जी को अच्छी तरह जानते थे क्योंकि वे भी उस कारखाने में काम कर चुके थे। रामनाथ जी ने कहा कब तक नौकरी करते रहोगे तुम्हारे शहर में रेल्वे की कोच फेक्ट्री खुली है। उसकी एन्सील्यरी युनिट के लिए कारखाना निजी रूप से खोला जाना है। अगर तुम हिम्मत कर सको जमीन दिलवाने से लेकर लोन पास कराने की सारी जिम्मेदारी मेरी। मोहनलाल जी ने अपनी मंजूरी दे दी। मंत्री जी ने उन्हें पन्द्रह दिनों तक रोका और उनका पूरा काम कराकर शहर भेजा। यहाँ आते ही मोहनलाल जी ने जी जान से फेक्ट्री का काम शुरू करा दिया। सबसे पहले जमीन हासिल की फिर उसपर कारखाने का निर्माण कराया। दो साल तक मोहनलाल जी ने न रात देखी और न दिन देखा। तब कहीं वे कारखाने की स्थापना कर सके। उनकी किस्मत ने साथ दिया उनका कारखाना चल निकला। मोहनलाल के नौकरी छोड़ने के बाद उनकी मशीन को कोई चला नहीं पाया। श्रीनिवासन की सारी कोशिशें फेल हो गईं आखिर उस मशीन को बंद करना पड़ा तथा बाहर की युनिट से उस मशीन के जाॅब बनवाने पड़े। वो काम मोहनलाल जी के कारखाने को मिल गया तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। उस काम से वे अपने वेतन से कई गुना अधिक पैसा कमा रहे थे। अब वही श्रीनिवासन उनके सामने भीगी बिल्ली बन जाता था। मोहनलाल साधारण आर्टीजन से उद्योगपति बना था इसलिए उसमें जरा भी घमंड नहीं था यही उसकी सफलता का राज था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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