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कहानी: सेकेण्ड हैण्ड कार

नरेश बाबू एक सेकैण्ड कार खरीदने के कारण पूरे साल भर परेशान रहे। उसकी बार बार रिपेयरिंग कराने में उनके ढाई लाख रुपये खर्च हो गए थे फिर भी वो बार बार काम निकाल रही थी। अब मैकेनिक उसका इंजन बदलने की बात कर रहा था। नया इंजन बहुत महँगा आ रहा था। मैकेनिक का कहना था कि सैकेण्ड हैण्ड इंजन लगवा लो पर नरेश बाबू सैकेण्ड हैण्ड कार खरीदने के निर्णय पर अभी तक पछता रहे थे इसलिए सेकेण्ड हैण्ड इंजन खरीदने का विचार उन्होंने त्याग दिया था। अंत में वो कार उन्होंने मुश्किल से अस्सी हजार रुपये में बेचकर पीछा छुड़ा लिया। इसमें उन्हें पूरे छः लाख रुपये का नुक्सान हुआ था फिर भी उनको इस बात से संतोष था कि घर में कलह का कारण बनी उस कार से उनका पीछा छूट गया था।
बात एक साल पुरानी है तब नरेश बाबू सेवानिवृत हुए थे। फंड का पैसा उन्हें मिला था उनकी पत्नी विमला की बहुत इच्छा थी कार खरीदने की। घर का मकान उनके पास था ही बेटे और बेटी की शादी वे कर ही चुके थे। बेटा एम बी ए करने के बाद पूना में नौकरी कर रहा था। नरेश जी कार के शोरूम पर गए तो पता चला कि छोटी कार भी सात लाख रुपये से कम में नहीं मिल रही है। फिर भी उन्होंने नई कार खरीदने का मन बना लिया था। तभी उनके मित्र सोहन ने कहा कि कहाँ नई कार खरीदने के फेर में पड़े हो सैकेण्ड हैण्ड कार खरीद लो तो बहुत सारे रुपये बच जाएँगे और मजा नई कार के जैसा ही आएगा। सोहन को वो एक अच्छा मित्र मानते थे उसकी बात उन्हें जम गई। सोहन ने उन्हें एक कार दिखाई उसकी कंडीशन ऊपर से देखने पर तो ठीक लग रही थी। सोहन बोला यह  कार शोरम पर तेरह लाख रुपये में मिल रही है। मैं यह तुम्हें साढ़े तीन लाख रुपये में दिलवा दूँगा। नरेश जी को यह सौदा ठीक लगा फिर उन्होंने सोचा सोहन उनका दोस्त है वो उनका बुरा थोड़ी चाहेगा। फिर भी उन्होंने वो कार खरीदने के पहले मैकेनिक को दिखाना उचित समझा। मैकेनिक ने इसके लिए उनसे दो हजार रुपये लिए और कार को देखकर कहा कार एकदम ठीक है आँख बंद करके खरीद लो। नरेश जी ने वो कार साढ़े तीन लाख रुपये में खरीद ली। नरेश एक सीधे सादे सरल इंसान थे वे अपने दोस्त के विश्वासघात को जान नहीं पाए। जिस मैकेनिक को उन्होंने दो हजार रुपये देकर कार की जाँच करवाई थी उसे सोहन ने पाँच हजार रुपये देकर अपनी तरफ मिला लिया और उसने झूठ बोलकर कार को सही बता दिया। सोहन ने कहा था कि कार कुल तीस हजार किलोमीटर चली है। कार का माइलो मीटर भी यही शो कर रहा था। शायद मीटर से भी छेड़छाड़ की गई थी। कार खरीदने के बाद सोहन ने अपने व्यवहार में बदलाव कर  लिया था। कुछ दिन तक तो वो कार ठीक चली पर एक बार इन्दौर जाते समय जब वो रास्ते में खराब हो गई तब उन्होंने एक मैकेनिक को दिखाया। उस मैकेनिक ने कार का इंजन देखकर कहा कार की हालत तो बहुत खराब है। वे बोले तीस हजार किलोमीटर तो चली है उसमें कार की ऐसी हालत कैसे हो सकती है। मैकेनिक बोला यह कार सात लाख किलोमीटर से अधिक चली है तथा एक्सीडेण्ट खाई हुई है। इसके सिर्फ टायर ट्यूब ठीक हैं बाकी यह कार एकदम खटारा है। नरेश बोले यह कार मैंने कुछ दिन पहले साढ़े तीन लाख रुपये में खरीदी है तथा खरीदने के पहले मैकेनिक को भी दिखाया था। इस पर वो मैकेनिक बोला दलाल ने उसको भी पैसे दे दिए होंगे। वे बोले दलाल के मार्फत इसे नहीं खरीदा ये तो मेरे खास दोस्त ने दिलवाई है। इस पर वो मैकेनिक बोला इस मतलबी जमाने में अच्छे दोस्त कहाँ मिलते हैं। जब नरेश जी ने इसका पता लगाया तो मालूम पड़ा कि सोहन ने डेढ़ लाख रुपये की दलाली खाई है। यह सुनकर उनके पाँव के नीचे की जमीन खिसक गई। कोई दोस्त पैसे के लिए इतना भी गिर सकता है। सोहन ने नरेश जी का फोन रिसीव करना बंद कर दिया था। जब नरेश सोहनलाल से मिलने उसके घर गए तो सोहनलाल ने दोस्ती को ताक में रख उन्हें अपमानित कर घर से भगा दिया। नरेश जी आहत मन से अपने घर आ गए। इधर उनका लड़का भी उस खटारा कार से परेशान होकर नरेश जी को ही बार बार इसका दोषी ठहरा रहा था। उनकी पत्नी विमला ने तो यहाँ तक कह दिया था कि तुमसे बड़ा मूर्ख मैंने दुनिया में दूसरा नहीं देखा था। साल भर में उस कार की रिपेयरिंग पर उनके ढाई लाख रुपये खर्च हो गए थे। फिर भी वो कार पूरी तरह ठीक नहीं हुई थी। उनको छः लाख रुपये का घाटा हुआ था और कम माइलेज के कारण एक लाख रुपये का पेट्रोल भराने में घाटा हुआ था। इतने रुपयों में ही तो शौ रूम से नई कार मिल रही थी। वे उस कार से इतने तंग आ गए थे कि उसे उन्होंने औने पौने दाम में बेचकर आज चैन की साँस ली थी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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