सुरेश सुदूर सतपुड़ा के सघन एवं दुर्गम जंगल के बीच में स्थित आदिवासियों के गाँव दुरगाँव के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में गणित के शिक्षक के पद पर कार्यरत था उस गाँव तक जाने का रास्ता बहुत कठिन था बीच में नर्मदा नही पड़ती थी उसे पार करने के बाद सतपुड़ा पर्वत श्रृखला का एक दुर्गम पहाड़ पड़ता था इसके बाद पाँच किलोमीटर का घना जंगल तब कहीं दुरगाँव नजर आता था सबसे ज्यादा परेशानी बरसात में होती थी। सुरेश की पत्नी सुनीता गाँव के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में नर्स के पद पर कार्यरत थी। जो उस केन्द्र की सर्वेसवा थी कहने को तो उस केन्द्र पर,एक डॉक्टर का पद भी स्वीकृत था उस केन्द्र पर दस का स्टॉफ स्वीकृत था मगर सुनीता अकेली उस केन्द्र पर विगत चार वर्षों से नर्स के पद पर कार्यरत थी।
सुरेश के हायर सेकेण्डरी स्कूल में चौदह पद थे जिनमें एक शिक्षक प्राथमिक में एक माध्यमिक में तथा एक हायर,सेकेण्री में पदस्थ था तीन शिक्षकों के ऊपर दो सौ छात्रों को शिक्षा प्रदान करने की जिम्मेदारी थी सुरेश के पास प्रभारी प्राचार्य के पद का भार भी था। उधर सुनीता भी स्वास्थ्य केन्द्र पर दिन भर व्यस्त रहती थी । सुरेश की सात वर्ष पूर्व दुरगाँव में पहली पदस्थापना हुई थी उसकी नौकरी की शुरूआत दुरगाँव से ही हुई थी । सुरेश एक ईमानदार एवं सीधे सरल स्वभाव का इंसान था उस समय सुरेश की शादी नहीं हुई थी । तीन वर्ष तक सुरेश दुरगाँव में आदिवासियों के बीच अकेला रहा था गाँव आधुनिक सुविधा साधनों से वंचित था उस गाँव में पहुँचने पर ऐसा लगता था जैसे आदिम युग में आ गए हों। सुरेश ने गाँव वालों को जीने के लिए घोर,संघर्ष करते हुए देखा था उसके सामने कई मौतें इस कारण हुई थीं क्योंकि उन्हें समय पर चिकित्सा नहीं मिली थी बारिश में गाँव के लोग मरीज को खाट पर लिटाकर तथा खाट को अपने कंधे पर रखकर बीस किलोमीटर दूर स्थित कस्बे में आते थे तब कहीं मरीज का इलाज हो पाता था सुरेश ने एक साल,तक तो यह देखा फिर गर्मियों की छुट्टी में प्राथमिक चिकित्सा का तीन महीने का कोर्स किया तथा एक निजी अस्पताल में इसकी प्रेक्टिस भी की इस बार की बरसात शुरू होने के पूर्व सुरेश अपना कोर्स पूरा करके गाँव में आ गया था बारिश में बीमारियों का अधिक प्रकोप रहता था सुरेश ने क्लीनिक खोल लिया था जिसमें वो सुब्ह शाम बैठकर मरीजों का इलाज करने लगा था। स्कूल के समय के बाद वो मरीजों का इलाज करने में व्यस्त हो जाता था। गाँव वाले उसका बहुत सम्मान करने लगे थे इस बारिश में सुरेश ने इलाज के अभाव में एक भी मौत नहीं होने दी थी। दो वर्ष तक सुरेश ने गाँव वालों की चिकित्सा की फिर उसकी शादी सुनीता से हो गई सुनीता ने नर्सिंग में बी एस सी की थी । सुरेश शादी के बाद सुनीता को दुरगाँव ले आया था यहाँ आकर सुरेश के क्लीनिक को सुनीता ने सम्हाल लिया था गाँव की महिलाओं को सुनीता के आने से इलाज की सुविधा मिल गई थी। सुनीता ने नर्स के पद के लिए स्वास्थ्य विभाग में आवेदन किया था। जिसमें उसका चयन हो गया था सुनीता ने अपनी स्वेच्छा से दुरगाँव के प्राथमिक स्वास्थ्त केन्द्र में अपनी पदस्थापना कराई थी उस स्वास्थ्य केन्द्र पर वर्षों से कोई स्टॉफ नहीं था सुनीता की पदष्थापना से केन्द्र खुलने लगा था तथा ग्रामीढों को इलाज की सुविधा मिलने लगी थी सुनीता केन्द्र,के परिसर में बने सरकारी आवास में रह रही थी सुरेश भी उसके साथ वहीं रहने लगा था सुरेश भी मरीजों के इलाज में सुनीता की पूरी सहायता कर रहा था। गाँव के लोग अत्यंत गरीब थे सुनीता और सुरेश उनकी निस्वार्थ भाव से सेवा कर रहे थे यही कारण था कि पूरा गाँव उनका सच्चे दिल से सम्मान करता था उनके लिए सबसे बड़ी यही खुशी थी और,यह सबसे बड़ा सम्मान भी था उनके पास दूर दूर से लोग अपना इलाज कराने आते थे और ठीक होकर उन्हें दुआएँ देकर जाते थे सुनीता तो महानगर में पली बढ़ी थी सुरेश की शिक्षा भी शहर में ही हुई थी दोनों पति पत्नी शहर के निवासी होने के बावजूद दुरगाँव जैसे दुर्गम गाँव में रहते हुए अनेक चुनौतियों का सामना करते हुए अपनी नौकरी कर रहे थे तथा अपनी नौकरी से संतुष्ट भी थे आज उन्होंने दुरगाँव में स्वास्थ्य शिविर का आयोजन कराया था जिसमें शहर,के एक बड़े निजी अस्पताल के डॉक्टरों ने दिनभर रहकर मरीजों का निशुल्क इलाज किया था। इस आयोजन से सुनीता और सुरेश को असीम सुख की प्राप्ति हुई थी।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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