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कहानी: मौसी

रूपा मौसी ने जीवन में बहुत दुख उठाए थे। शादी के चार साल बाद उनके पति देवेन्द्र का दुर्घटना में दुखद निधन हो गया था। तब उनका बेटा और बेटी बहुत छोटे थे। उनके पति शिक्षा विभाग में शिक्षक के पद पर कार्यरत थे। रूपा मौसी अधिक पढ़ी लिखी तो थी नहीं इसलिए उन्हें अनुकंपा नौकरी में चतुर्थ श्रेणी का भृत्य का पद मिला था और वो छोटी सी नौकरी कर अपने बच्चों की परवरिश करती रहीं थीं। आज रूपा मौसी बहुत दुखी थीं। उनकी बहन की बड़ी लड़की कनुप्रिया की शादी थी। जिसमें उन्हें इसलिए नहीं बुलाया गया था क्योंकि वे छोटे पद पर कार्यरत थीं और उनकी बहन उन्हें अपने रिश्तेदारों से नहीं मिलाना चाहतीं थीं।
वैसे रूपा मौसी स्वभाव की बहुत अच्छी थी। अपनी बहन के दोनों बच्चे उनके पास ही रहकर पढ़े थे। कनुप्रिया ने बी एड रूपा मौसी के घर रहकर ही किया था तथा रूपा जी के पास रहकर पी जी टी की तैयारी की थी। वहीं से कनुप्रिया की केन्द्रीय विद्यालय में पी जी टी की नौकरी लगी थी। कनुप्रिया ने तब कहा था मौसी आप मेरी माँ से भी बढ़कर हो आपने ही मुझे पढ़ा लिखाकर इस योग्य बनाया है। तब मौसी ने कहा था यह तो मैंने अपनी खुशी के लिए किया है तू भी तो मेरी बेटी ही है। लेकिन नौकरी लगने के बाद कनुप्रिया के व्यवहार में परिवर्तन आ गया था। अब वो रूपा मौसी से दूरी बनाकर रहने लगी थी। कनुप्रिया की शादी जब बैंक मैनेजर उमेश से तय हुई तो रूपा मौसी को सगाई में भी नहीं बुलाया गया था। तब रूपा मौसी ने यह सोचकर संतोष कर लिया था कि शादी में तो उन्हें जरूर बुलाया जाएगा पर शादी में भी उन्हें नहीं बुलाया गया था। निमंत्रण पत्र पर उनका नाम भी नहीं था। रूपा मौसी को इसका बहुत दुख था हाँलाँकि उनके दोनों बच्चे बेटा दीपक और बिटिया रश्मि उन्हें बहुत चाहते थे। दीपक की पत्नी ज्योति भी उनका बहुत ख्याल रखती थी। उनका लड़का दीपक प्रोफेसर था तथा बहू उच्च माध्यमिक शिक्षक। पर वे रूपा मौसी को बहुत चाहते थे। बहू उनका बहुत आदर करती थी। उन्होंने कनुप्रिया की शादी में आमंत्रित न किए जाने पर बहुत समझाया था फिर भी उनका दुख कम नहीं हो पा रहा था। जबकि कनुप्रिया की शादी के पहले कनुप्रिया के पापा ओमप्रकाश उनके यहाँ एक माह तक रुके। उनकी दोनों आँखों के मोतियाबिंद का ऑपरेशन रूपा मौसी ने ही कराया था। आज रूपा मौसी को मन में पहली बार हीन भावना आई थी। अभी तो उनके रिटायरमेन्ट में आठ वर्ष का समय बाकी था। कुछ देर तक अनमनी रहने के बाद उन्होंने अपने आपको सम्हाल लिया था। इस छोटी नौकरी ने उन्हें बहुत कुछ दिया था। इसके कारण वो अपना पक्का मकान बना पाईं थीं। बच्चों की पढ़ाई भी उन्होंने इसी नौकरी के कारण कराई थी। उन्हें अपनी इस छोटी सी नौकरी से बहुत लगाव था। उन्होंने कनुप्रिया को उसकी मम्मी तथा पापा को दिल से माफ़ कर दिया था। तब कहीं जाकर उनके मन को संतोष मिला था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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