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कहानी: चाची का मकान

शहर की घनी बस्ती में दुर्गा चाची का छः सौ वर्गफीट के भूखण्ड पर तीन मंजिला मकान था जिसका अठारह हज़ार रुपये प्रतिमाह किराया आता था जिसमें चाची आराम के साथ रहतीं। उसी मकान को दुर्गा चाची के लड़के अखिल ने चाची के निधन के तीन महीने बाद चालीस लाख रुपये में बेच दिया था। अखिल का शहर की अशोक विहार कॉलोनी में काॅनर्र पर चौबीस सौ वर्गफीट का मकान था जिसमें दो तरफ सड़क थी। तथा उस मकान में नीचे आठ दुकानें थी। वो मकान भी तीन मंजिला था जिसका डेढ़ लाख रुपये प्रतिमाह किराया आता था। अखिल कोई काम नहीं करता अखिल की पत्नी पोस्ट ऑफिस में क्लर्क की नौकरी करती थी।
अखिल का अशोक विहार कॉलोनी का मकान भी दुर्गा चाची और उनके पति भुवन चाचा ने मिलकर बनवाया था जिसमें अखिल अपने परिवार सहित सुख से रह रहा था। दुर्गा चाची के पति भुवन चाचा का निधन तीन साल पहले हो गया था। तब चाची अखिल के पास रहने आ गई थी। उस समय अखिल ने चाची पर शहर की घनी बस्ती वाला मकान बेचने का दवाब बनाया था। चाची को भुवन जी के निधन का सदमा था वे भी मकान बेचकर अखिल के साथ ही रहने को तैयार हो गईं थी। उस दौरान वे एक महीने अखिल और बहू के साथ रही थीं। उस एक महीने में उन्हें यह अच्छी तरह अहसास हो गया था कि अगर उन्होंने वो मकान बेच दिया तो बहू बेटों के साथ वे आजादी से नहीं रह सकेंगी इसलिए उन्होंने उस मकान को बेचने का इरादा त्याग दिया था तथा वापस उसी मकान में रहने आ गईं थीं। अखिल से उन्होंने कह दिया था अपने जीते जी मैं यह मकान नहीं बेचूँगी मेरे मरने के बाद तू इसे भले ही बेच देना। दुर्गा चाची और भुवन चाचा इस शहर में पैंतालीस साल पहले गाँव से आए थे। भुवन चाचा ने यहाँ किराये के मकान में डेयरी खोली थी जिसमें वे गाँव से आया दूध, दही, छाछ, मावा, घी तथा पनीर बेचते थे। अखिल उनका इकलौता लड़का था तब भुवन चाचा ने पाई पाई जोड़कर प्लॉट खरीदकर उसपर मकान बनवाया था जिसमें वे अच्छे से रह रहे थे। किराये के मकान से उन्हें छुटकारा मिल गया था। दुकान की कमाई से उन्होंने उस मकान को तीन मंजिला बना लिया था जिसमें किरायेदार भी रह रहे थे। दुर्गा चाची और भुवन चाचा बड़े किफायत से रहते थे एक रुपया भी वे कभी फिजूल खर्च नहीं करते थे। तभी उन्होंने उस वक्त नवनिर्मित अशोक विहार कॉलोनी में चौबीस सौ वर्ग फुट का भूखंड खरीदकर उस पर मकान बनवाया था। बाद में मेन रोड निकलने पर उन्होंने ग्राउण्ड फ्लोर पर आठ दुकानें निकाल ली थीं। उन दुकानों में से एक दुकान अखिल ने भी खोल ली थी। दुर्गा चाची ने अखिल की शादी रीना से कर दी थी। रीना सरकारी नौकरी कर रही थी। अखिल अपनी पत्नी के साथ अशोक विहार कॉलोनी के मकान में रहने लगा था। दुर्गा चाची और भुवन चाचा पुराने मकान में ही रह रहे थे। जब भुवन चाचा की उम्र साठ साल की हो गई तब अचानक उनकी तबियत खराब हो गई जिसके कारण वे चार माह तक अपनी दुकान नहीं खोल सके। अखिल ने भी दुकान नहीं खोली थी उनकी दुकान ठप हो गई थी। आखिर उन्होंने दुकान बंद कर दी थी। अब उनकी आय का जरिया मकान का किराया था जिसमें उनका गुजारा आराम से चल रहा था। भुवन चाचा की मृत्यु सत्तर साल की उम्र में हुई थी। उनकी मृर्त्यु के तीन साल बाद दुर्गा चाची का भी निधन हो गया था। अखिल ने उनके निधन के बाद ये मकान बेचकर उनकी निशानी मिटा दी थी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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