सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: बेबसी

सोहनलाल सब्जी उत्पादक किसान था लेकिन पिछले कुछ दिनों से सब्जी के दामों में गिरावट से परेशान था। सब्जी तड़ाई तथा मंडी लाने का खर्च तक नहीं निकल पा रहा था जिसके कारण वो घोर आर्थिक संकट से घिर गया था। इससे बचने के लिए उसने ई रिक्शा ले लिया था जिससे उसको एक निश्चित नियमित आय होने लगी थी। कुछ क्षतिपूर्ति वो दूध बेचकर भी कर रहा था।
गत वर्ष सोहनलाल ने अपने खेत में लहसुन प्याज की खेती की थी। उस समय फसल का उत्पादन कम हुए था। मौसम की मार का भी फसलों के उत्पादन पर असर पड़ा था। जिसके कारण उसे सरकार से मुआवजा भी अच्छा मिला था। तथा भाव अच्छे होने के कारण उसे लाभ भी अच्छा हुआ था लेकिन इस बार स्थिति विपरीत हुई। मौसम अनुकूल रहने के कारण बंपर फसल हुई थी जिसके कारण मंडी में सब्जियों की आवक बहुत ज्यादा हो गई और दामों में गिरावट ने सोहनलाल की उम्मीदों पर पानी फेर दिया था। सोहनलाल ने जब अपने खेत में टमाटर की फसल बोई थी उस समय टमाटर सौ रुपये किलो बिक रहा था, मटर ढाई सौ रुपये, हरा धनिया तीन सौ रुपये और हरी मिर्च डेढ़ सौ रुपये किलो थी। सोहनलाल ने अपने खेत में इन फसलों को उगाया था। फसलों की बढ़त देखकर सोहनलाल बहुत खुश हो रहा था। आसपास के सभी खेतों में सब्जियों की फसल बहुत अच्छी थी। किसानों ने खूब मेहनत की थी लागत भी खूब लगाई थी मगर जब उत्पादन शुरू हुआ तो इनकी आवक से पूरा बाजार पट गया। नतीजा यह हुआ कि टमाटर थोक में तीन रुपये, मटर पाँच रुपये किलो, प्याज पाँच रुपये एवं लहसुन पन्द्रह रुपये किलो के भाव पर बिकने लगा। किसान दुखी था और आम आदमी खुश। सब्जियाँ बहुत सस्ती होने का लाभ सीधा आम आदमी को मिल रहा था। सोहनलाल जैसे किसानों की हालत बहुत ज्यादा खराब थी। फसल अच्छी थी जिसके कारण इस बार मुआवजा भी नहीं मिलना था। सोहनलाल ने सब्जी मंण्डी में ले जाने की बजाए सब्जी को तोड़कर पास के सूखे नालें में फैंकना शुरू कर दिया था। सोहनलाल के साथ किशनलाल पचास क्विंटल टमाटर लाया था पर वो बिके ही नहीं। हारकर वो उसे सब्जी मण्डी के पास बने कचराघर में फैंककर दुखी मन से घर आ गया था। फसलों की उत्पादन लागत बहुत ज्यादा थी और भाव बहुत ज्यादा कम। सोहनलाल के गाँव के बहुत से किसान खेतों को छोड़कर मजदूरी के लिए गुजरात चले गए थे। इधर सोहनलाल ने भी बैंक से लोन लेकर ई रिक्शा ले लिया था जिसकी आय से उसकी गृहस्थी की गाड़ी चल रही थी।कई किसानों ने तो अपने खेतों में पालतू जानवर छोड़ दिए थे। जिनका दूध बेचकर किसान अपना घर का खर्च चला रहे थे। सोहनलाल अपने खेतों में सब्जी की फसल लगाने के निर्णय पर बहुत पछता रहा था। सोच रहा था इससे अच्छा होता कि वो अपने खेत में गेहूँ चने की फसल बो देता। उनके भाव सब्जियों के मुकाबले अच्छे थे। पिछले साल जहाँ सोहनलाल कम उत्पादन के कारण दुखी था वहीं इस साल फसलों का बम्पर उत्पादन उसके दुख का कारण बना हुआ था।


*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: शादी के लिए नौकरी

रवीन्द्रसिंह को एक प्राईवेट दवा कंपनी में नौकरी किए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि वह नौकरी छोड़ने का इरादा करने लगा था  लेकिन उसकी  माँ कंचन  का कहना था  जब तक  तेरी शादी न हो जाए  तब तक नौकरी करता रह जब शादी हो जाए तब नौकरी छोड़ना जबकि रवीन्द्र सिंह सोच रहा था कि एक महीना गुजारना मुश्किल हो रहा है कब तो उसकी शादी होगी और कब वो ऐसी नौकरी से पीछा छुड़ाएगा रवीन्द्र सिंह की  उम्र पैंतीस वर्ष की होने जा रही थी  और वो अभी तक कुँवारा  था कंचन जी का वह इकलौता लड़का था  उनकी दो लड़कियाँ थीं दोनों रवीन्द्द से बड़ीं थीं दोनों की शादी हो गईं थी दोनों के बच्चे   कोई छठी में तो कोई सातवीं में तो कोई आठवीं में पढ़ रहा था।  कंचन जी कस्बे के  एक सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी कर रही थीं  उनके पति सुरेन्द्रसिंह  सरकारी दफ्तर में बाबू थे  सरकारी काम से जब वे कहीं जा रहे थे तब  एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था।  जब रवीन्द्र एक साल का था तब उसके पिता का निधन हुआ था उसकी दोन...