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कहानी: छोटी सी दुकान

राजेन्द्र की बस स्टैण्ड पर चाय समोसा पोहा जलेबी की छोटी सी दुकान थी। इस दुकान को खोले हुए उसे पाँच वर्ष ही हुए थे पर इस दुकान ने उसे गरीबी तथा बेरोजगारी से उबार दिया था। उसकी शादी हो गई थी और वो दो बच्चों का पिता भी बन गया था।
राजेन्द्र के पिता रमेश कृषि विभाग में क्लर्क थे। वे सात साल पहले रिटायर हुए थे यह बात तभी की है। तब नगरपालिका ने बस स्टैण्ड से अतिक्रमण हटाया था। उससे जो जगह निकली थी उस पर नगर पालिका ने दुकानें बनवाईं थीं। दुकानें तैयार होने के बाद उनकी नीलामी की तारीख नगर पालिका ने निर्धारित की थी। उस नीलामी में हिस्सा लेने के लिए रमेश जी भी पहुँच गए थे। इसकी सूचना उन्होंने किसी को भी नहीं दी थी। सारी दुकाने नीलाम होती जा रही थीं। उन दुकानों में एक आठ बाई आठ फुट की सबसे छोटी दुकान भी थी जिसे लेने में किसी की रूचि नहीं थी। उसे रमेश जी ने तीन लाख रुपये में ले लिया था। जब यह ख़बर रमेश जी ने घर पर सुनाई तो सब उन पर बहुत नाराज हुए। पत्नी बोली कौन चलाएगा वो दुकान रिटायरमेन्ट के तीन लाख रुपये बर्बाद कर दिए इससे अच्छा तो घर की मरम्मत ही करा लेते। इस बुढ़ापे में आप क्या दुकान चलाएँगे। रमेश जी ने राजेन्द्र की तरफ देखा तो राजेन्द्र बोला मैं दुकान नहीं चलाने वाला मैंने बी कॉम किया है। और मैं भी आगे चलकर नौकरी ही करूँगा। रमेश जी घर का रुख देखकर जरा भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने दुकान हैण्डओवर ली तथा उसमें ताला लगा दिया। अब राजेन्द्र को नौकरी की तलाश थी। नौकरी की तलाश में वो पूरे दो साल भटका लेकिन उसे छोटी मोटी नौकरी तक नहीं मिली। पिताजी की पेन्शन से मुश्किल से घर का गुजारा चल रहा था। राजेन्द्र की जेब में तो एक रुपया भी नहीं था। ऐसी स्थिति में नुक्कड़ पर रहने वाले हलवाई जगत मामा ने राजेन्द्र से कहा कि चाँदपुर गाँव में वार्षिक मेला लग रहा है जो पूरे पाँच दिन चलेगा। पाँच दिन के मैं तुम्हें पूरे ढाई हजार रुपये दूँगा अगर तुम मेरे साथ काम करना पसंद करोगे तो। तुम्हें लेबर की तरह काम नहीं करना है बस काउण्टर पर बैठकर रुपये पैसे का हिसाब रखना है। राजेन्द्र यह जानकर काम करने को तैयार हो गया तथा मामा के साथ मेले में आ गया। मेले में मामा ने होटल खोली थी। इन पाँच दिनों में राजेन्द्र का नजरिया पूरी तरह बदल चुका था। पाँच दिनों में मामा ने अच्छा रुपया कमाया था। मेले में ही राजेन्द्र की मामा की दुकान के हलवाई सोहन से बात हुई तो उसने कहा मामा मुझे एक दिन काम करने के महज तीन सौ रुपये देते हैं जिससे उनका परिवार मुश्किल से चल रहा था। अगर आपकी नजर में कोई कहीं नौकरी हो तो बताना। अचानक राजेन्द्र के मन में विचार आया और उसने हाँ कह दी थी। कहा था अपनी बस स्टैण्ड पर एक छोटी सी दुकान है उसमें काम करना है। सोहन ने कहा तो ठीक है। और मेले से आते ही राजेन्द्र ने बस स्टेण्ड स्थित दुकान की साफ सफाई की और वो दुकान खोल ली थी। सोहन शुरू से ही दुकान में हलवाई का काम कर रहा था।



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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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