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कहानी: प्रमोशन न मिलने का दुख

रतनपुर के सरकारी स्कूल में सहायक शिक्षक के पद पर कार्यरत रहे लीलाकिशन तिरतालीस साल की नौकरी करने के बाद उसी पद से रिटायर हो गए थे जिस पद से उन्होंने अपनी नौकरी की शुरूआत की थी। सेवानिवृति के समय उन्हें एक ही बात का दुख था कि उनको एक भी प्रमोशन नहीं मिला था जबकि वे प्रथम श्रेणी में हिन्दी में एम ए थे तथा उन्होंने एम एड भी प्रथम श्रेणी में किया था वे एक उत्कृष्ट शिक्षक थे फिर भी प्रमोशन से वंचित रहे थे।
पूरे जिले में उन जैसा हिन्दी का मर्मज्ञ शिक्षक और कोई नहीं था फिर भी वे पहली क्लास पढ़ाने वाले शिक्षक का कार्य कर रहे थे।
लीलाकिशन जी का मुकद्दर ने शुरू से ही साथ नहीं दिया था एम ए करने के बाद उन्हें एक प्राइवेट कॉलेज में सहायक प्राध्यापक के पद पर चार्य करने का अवसर मिल रहा था पर वे अपनी सरकारी नौकरी छोड़ने का मोह नहीं त्याग सके। बाद में उस कॉलेज का सरकार ने अधिग्रहण कर लिया और उनसे कम अंकों से पास होने वाला उनसे जूनियर,रविकाँत सरकारी सहायक प्राध्यापक बन गया उनकी हायर सेकेण्डरी में शिक्षाकर्मी वर्ग एक की नौकरी भी लग रही थी पर उसमें भी उनकी यह सरकारी नौकरी आड़े आ गई बाद में उनका भी संविलियन हो गया और वे सब उच्चमाध्यमिक शिक्षक बन गए उनमें से एक दिनेश तो उनका पढ़ाया हुआ छात्र था जो संकुल केन्द् के प्रभारी प्राचार्य के पद पर,कार्यरत था लीलाकिशन जी का दूसरा बड़ा दुख का कारण यह था कि दस वर्ष पूर्व पंचायत ने जिस राकेश को शिक्षा गारंटी स्कूल में गुरूजी के पद पर नियुक्त किया था उसने हायर सेकेण्डरी परीक्षा नकल से पास की थी उसे ठीक से हिन्दी तक पढ़ना लिखना नहीं आती थी उसने एक मान्यता प्राप्त मुक्त विश्वविद्यालय के उस संचालक से साठगाँठ कर ली जो पैसे लेकर परीक्षा पास कराता था वो कोरी उत्तरपुस्तिका लेकर फिर अपने खास युवकों से उस पर,लिखवाता था तथा बिना परीक्षा दिए पास करने की गारंटी देता था । राकेश ने वहाँ से अंग्रेजी में बी ए की डिग्री हासिल कर,ली थी जबकि वो अंग्रेजी पढ़ना लिखना नहीं जानता उस राकेश का उच्च पद पर,प्रभार के नाम से अंग्रेजी के माध्यमिक शिक्षक के पद पर प्रमोशन हो गया था वो लीलाकिशन जी के स्कूल में प्रभारी प्रधानाध्यापक के पद पर कार्यरत था। जबकि लीलाकिशन जी योग्य होने के बाद भी तिरतालीस साल से प्राथमिक शिक्षक के पद पर कार्य कर रहे थे। लीलाकिशन जी आज सेवानिवृत हो गए थे। इसके साथ ही उन्हें अपने ही जूनियरों के अपमान जनक व्यवहार से छुटकारा मिल गया था यह उनके लिए बड़ी खुशी की बात थी।प्रमोशन न मिलने का मलाल तो था ही।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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