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कहानी: चार दुकानें

काशी बाई की ट्रान्सपोर्ट नगर के महेन्द् मार्केट में चार दुकाने थीं । जिसका किराया चालीस हज़ार रुपया प्रतिमाह उन्हें मिलता था जिससे उनकी गुज़र बसर आराम से हो रही थी उनकी उम्र अब सत्तर वर्ष की हो गई थी वे पिछड़ी बस्ती उमा कॉलोनी में रहती थीं जहाँ उनका खुद का छोटा सा मकान था उनकी आय का साधन उन चार दुकानों का किराया ही था ये चार दुकानें भी काशीबाई को महेन्द्र मार्केट की मालकिन गौरो देवी ने अपनी दस वर्ष तक देखभाल,करने के बदले में दी गई थीं। जिनके किराये से काशी बाई का खर्च चल रहा था।
महेन्द्र मार्केट की मालकिन गौरी देवी जब पैसठ वर्ष की थीं तब उनका आधा शरीर लकवा ग्रस्त हो गया था उनके दोनों लड़कों के पास फुर्सत नहीं थीं उनकी दोनों बहुओं ने अपनी सास गौरी देवी की सेवा करने से साफ इंकार कर दिया था । तब उनके बड़े बेटे मनीष ने काशीबाई को उनकी पूरी देखभाल,करने के लिए रखा था ।काशीबाई शहर के एक प्राइवेट अस्पताल के एक वार्ड में काम करतीं थीं जिसका उन्हे सात हजार रुपये बेतन मिलता था। मनीष ने बारह हजार रुपये के वेतन पर काशीबाई को अपनी बीमार माँ की देखभाल का जिम्मा सौंप दिया था । आज से पन्द्ह वर्ष पूर्व बारह हजार का वेतन कम नहीं था इसके बदले में एक मरीड की ही तो देखभाल करना थी अस्पताल में तो वे बीस मरीजों की देखभाल करतीं थीं। महेन्र मार्केट की मालकिन गौरी देवी के पति महेन्द्र सिंह ने चालीस साल पहले सड़क किनारे की एक एकड़ जमीन अस्सो हजार रुपये में खरीदी थी महेन्द्र सिंह जी कपड़े के थोक व्यापारी थे बीस साल तक वो जमीन ऐसी ही पड़ी रही लेकिन जह महानगर का विस्तार हुआ और नई कॉलोनियाँ बनी तो महेन्द्र सिंह जी की एक एकड़ जमीन चारो तरफ रोड से घिर गई थी। उस जमीन की कामर्शीयल वेल्यू देखकर महेन्द्र सिंह जी ने उस पर महेन्दर मार्केट बनाकर सत्तर दुकानों का निर्माण कराया था तथा उस पर अस्सी फ्लेट बनवाए उनकी पूरी दुकाने देखते देखते किराये पर उठ गईं थीं शहर का प्रमुख स्थान होने के कारण उनके अस्सी फ्लेट भी किराये पर उठ गए थे। जो उनकी आमदनी का सबसे बडा जरिया बन गया था जिसका लाखों रुपया किराये के रूप में उन्हें प्राप्त हो रहा था उनके दोनों बेटे बहुराष्द्रीय कंपनी में मैनेजर थे । पूरा महेन्द्र भार्केट उनकी पत्नी गौरी देवी के नाम था महेन्द्र सिंह जी की हार्ट अटेक के कारण मौत हो गई थी तभी से गौरी देवी अकेली ही रह रहीं थीं जब वे लकवाग्रस्त हो गईं तब उन्हें सहारे की जरूरत महसूस हुई तब अपनों ने ही उनका साथ छोड़ दिया उनके किराये में तो सब हिस्सा बँटा लेते थे लेकिन उनकी सेवा करने कोई तैयार नहीं था ऐसे में काशीबाई ने उनकी खूब सेवा की थी काशी बाई सिर्फ रात में सोने के लिए अपने घर जाती थी बाकी पूरा समय वो गौरी देवी की सेवा में लगाती थी गौरी देवी उनकी सेवा से बहुत ख़ुश थीं । काशीबाई ने पूरे दस साल तक गौरीदेवी की सेवा की थी। उनकी तनख्वाह बीस हज़ार रुपये प्रतिमाह हो गई थी। गौरी देवी को इसी बात की चिंता रहती थी कि उनके निधन के बाद काशीबाई की देखभाल कौन करेगा। बुढ़ापे में उनका क्या होगा यही सब सोचकर अपनी मौत के दस दिन पहले उन्होंने वकील को बुलवा कर चार दुकानों की वसीयत काशीबाई के नाम कर दी थी। आज गौरी देवी के निधन हुए पूरे पाँच साल हो गए थे। इन पाँच सालों में काशीबाई एक क्षण के लिए भी गौरी देवी जी को भुला नहीं पा रही थी। उन्होने मरने से पहले काशीबाई का बुढ़ापा सुधार दिया था । आज वो आत्मनिर्भर थीं यह उनके लिए बड़ी ख़ुशी की बात थी।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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