अशोक दस वर्ष पूर्व अपनी ससुराल में घर जँवाई बनकर रहा था। मात्र छः महीने में उसे इतने कटु अनुभव हुए कि वो ससुराल से आने के बाद दस वर्षों में फिर कभी अपनी ससुराल नहीं गया ना ही उसकी पत्नी सुनीता ने कभी उसे ससुराल ले जाने पर जोर दिया। उसके साथ गुलामों से भी अधिक बुरा बर्ताव किया गया था।
अशोक की शादी जब सुनीता के साथ हुई थी तब कुछ दिनों तक अशोक का अपनी ससुराल में खूब आदर सत्कार हुआ था जिससे अशोक बहुत प्रभावित था। अशोक ठेकेदार के यहाँ राज मिस्त्री का काम करता था। एक दिन जब अशोक अपनी ससुराल में था तब उसके ससुर ओम प्रकाश ने उससे पूछा दिन भर ठेकेदार के यहाँ काम करते हो इसके बदले में ठेकेदार तुम्हें कितने रुपये देता है। अशोक ने कहा चार सौ रुपये, सुनकर ओमप्रकाश ने उसकी खिल्ली उड़ाते हुए कहा बस चार सौ ही रुपये उसमें घर का खर्च कैसे चलता होगा पूरे ग्यारह घंटे खर्च करने के बाद मात्र चार सौ रुपये की कमाई तो बहुत कम है। फिर ओमप्रकाश बोला मुझे देखो रोज तीन घंटे से ज्यादा काम नहीं करता फिर भी एक हज़ार रुपये रोज कमा लेता हूँ। ओमप्रकाश सब्जी का ठेला लगाता था। सुबह सात बजे सब्जी मंडी जाता वहाँ से ताजी सब्जियाँ लाता और रोज आठ बजे ठेले पर सब्जी रखकर फेरा लगाता। दस बजे तक सारी सब्जियाँ बेचकर घर आ जाता था। फिर दिनभर उसके पास कोई काम नहीं रहता था। अशोक ओमप्रकाश की बात सुनकर बड़ा प्रभावित हुआ। ओम प्रकाश ने कहा छोड़ो ये ठेकेदार का काम मेरी मानो तो तुम भी सब्जी का ठेला लगा लो। सुनकर अशोक बोला तो कुछ नहीं मगर ससुर की बात ने उसपर गहरा असर छोड़ दिया था। एक दिन पैसे को लेकर अशोक का ठेकेदार से कुछ विवाद हो गया जिससे अशोक ने ठेकेदार के साथ काम करना बंद कर दिया और अपनी पत्नी सुनीता के कहने पर वो अपनी ससुराल आ गया। ससुर ने कहा अच्छा किया जो तुमने नौकरी छोड़ दी। दो दिन तक तो अशोक की खूब मेहमान नवाजी हुई तीसरे दिन ओमप्रकाश अशोक को अपने साथ सब्जी मंडी ले गया जहाँ से उन्होंने सब्जियाँ खरीदीं। उनको दो ठेलों में जमाया ओम प्रकाश तो अपना ठेला लेकर अपने निर्धारित रूट पर चला गया और फिर अशोक ने भी ठेले पर सब्जी जमाकर बाजार का रुख किया। अशोक को पहले सब्जी बेचने का अनुभव तो था नहीं इसलिए उसे पूरा दिन लग गया सब्जी बेचने में। शाम को जब वो सब्जी बेचकर घर आया तो उसके ससुर ने उससे पाई पाई का हिसाब ले लिया तथा बदले में उसे जेबखर्च के लिए एक रुपया तक नहीं दिया और कम मुनाफा होने पर उस पर अपनी खीझ निकाल दी। ससुर का व्यवहार दिनोंदिन उसके प्रति खराब होता जा रहा था। अशोक को पता चल गया था कि सब्जी के धंधे में एक हजार रुपये रोज की कमाई नहीं होती उसके ससुर ने उससे झूठ कहा था। खाना खाते समय अशोक को अनेक कड़वी बातें सुनने को मिलती थीं। इसके बाद भी एक दिन उसके ससुर ने उसे एक किराये के मकान में रखकर अपने घर से निकाल दिया। अशोक के पास पूँजी के नाम पर एक रुपया भी नहीं था। हारकर उसने एक फैक्ट्री में मजदूरी करना शुरू कर दिया। उसकी सास दो चार दिन में एक बार आती तो सिर्फ अपनी बेटी सुनीता से बात करती। अशोक से उसकी कोई बातचीत नहीं होती थी। इस बीच सुनीता बीमार पड़ी तो उसकी सास ने अपनी बेटी का इलाज तो करवा दिया और जब अशोक बीमार पड़ा तो उसकी खैर खबर तक नहीं ली। आखिर अशोक ने वापस अपने घर जाने का फैसला कर कर दिया और फिर अपने घर आ गया। ठेकेदार ने उसे फिर से काम पर रख लिया था। अशोक ने इसके बाद फिर अपनी ससुराल से कभी कोई वास्ता नहीं रखा था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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