वीरपुर गाँव के सुखराम सेन चुनावी रंजिश के कारण पिछले छः माह से परेशान थे। उनकी गाँव में हेयर कटिंग की दुकान थी उसकी ग्राहकी भी चौपट हो गई थी। कोई उनको मजदूरी तक नहीं दे रहा था पर दो दिन पूर्व हुए समझौते के बाद अब कहीं उन्हें राहत मिली थी। गलतफहमी दूर होने पर यह संभव हुआ था।
छः माह पूर्व की बात है गाँव में पंचायत चुनाव का दौर चल रहा था। चुनाव में गाँव के दबंग नेता और संपन्न तथा प्रभावशाली किसान किशन लाल भी सरपंच पद के प्रत्याशी थे साथ ही वे जनपद सदस्य का चुनाव भी लड़ रहे थे। सुखराम के परिवार के छः वोट थे जिस पर किशनलाल अपना हक समझते थे। सुखराम ने भी उन्हें ही वोट देने का वादा किया था लेकिन चुनाव के दो दिन पूर्व सुखराम को अपनी ससुराल जाना पड़ा क्योंकि उसकी सास की तबियत बहुत ज्यादा खराब हो गई थी। सुखराम ने सोचा था कि एक दिन वहाँ रुककर वो वोट डालने आ जाएगा लेकिन ऐसा हो नहीं सका। खास चुनाव के दिन ही सुखराम की सास का निधन हो गया और सुखराम ससुराल का होकर ही रह गया। जब अंत्येष्टी हुई तब तक मतदान का समय खत्म हो गया था। मतदान के बाद वोटों की गिनती हुई जिसमें सरपंच का चुनाव किशन लाल पाँच वोटों से हार गए थे। हाँलाकि जनपद सदस्य का चुनाव वे भारी बहुमत से जीत गए थे पर सरपंच के चानाव में हार उन्हें बहुत दुखी कर रही थी। चुनाव के दिन उन्होंने चार बार अपने कार्यकर्ता सुखराम के घर भेजे थे पर हरबार उन्हें घर में ताला लगा मिला था। सुखराम जब सास की तेरहवीं के बाद वीरपुर गाँव आया तो देखा कि गाँव का माहौल बदला हुआ है कोई उसकी बात सुनने को तैयार नहीं था। उसकी दुकान पर भी कोई ग्राहक नहीं आ रहा था मजदूरी तक के लाले पड़े हुए थे। किशनलाल सुखराम की कोई बात सुनने को तैयार नहीं थे जबकि वे जनपद पंचायत के अध्यक्ष निर्वाचित हो गए थे। यह पद सरपंच के पद से बड़ा था पर किशनलाल सरपंच के पद पर अपनी हार को भुला नहीं पा रहे थे। आखिरकार सुखराम ने गाँव छोड़ने का मन बना लिया था। लेकिन इसके पहले वे एक आखिरी कोशिश करना चाहते थे। उन्होंने किशनलाल के पिताजी पटेल हुकुम सिंह से बात करने का इरादा किया। हुकुम सिंह पूर्व में तीस साल तक वीरपुर के सरपंच रहे थे। उनका गाँव में बड़ा सम्मान था ग्रामीण उनकी बात मानते थे। सुखराम ने उन्हें सारी बात बताई तथा यह भी कहा कि आपके पिताजी सौ साल पहले मेरे दादाजी हेतराम जी को वीरपुर गाँव लाए थे तथा उनकी सुरक्षा तथा उनकी रोजी रोटी चलाने की पूरी जिम्मेदारी उन्होंने ली थी। आज उनके ही पोते किशनलाल ने उनका गाँव में रहना मुश्किल कर दिया था। हुकुम सिंह सारी बातें जानकर बोले सुखराम इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है। मैं किशनलाल से बात करूँगा वो मेरी बात टालेगा नहीं वो मुझे बहुत मानता है। सुखराम हुकुम सिंह की बात सुनकर आश्वस्त होकर घर आ गए थे। किशनलाल जी के शहर से आने के बाद हुकुम सिंह ने उन्हें अपने पास बुलाया और सुखराम की सारी स्थति स्पष्ट कर दी थी जिसे सुनकर किशनलाल जी को बहुत पछतावा हो रहा था। शाम को जब तक उन्होंने सुखराम को गले से लगाकर स्नेह प्रगट किया तब उनका मन संतोष से भरा। इसके साथ ही सुखराम का काम धंधा भी चल निकला था और वो बहुत खुश नजर आ रहा था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
भोपाल मध्यप्रदेश
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