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कहानी: गुणवत्ता

मनोहर लाल दस वर्ष पहले जिस नमकीन बनाने वाले प्लांट में काम करते थे आज उसे बंद हुए पाँच वर्ष हो गए थे जबकी मनोहर लाल जी के द्वारा घरेलू उद्योग के तहत तैयार नमकीन दुर्गानगर की पहचान बन चुका था। मनोहरलाल जी ने यह काम मालिक द्वारा उन्हें नौकरी से निकाले जाने के बाद घरेलू उद्योग के अंतर्गत शुरू किया गया था। अपनी गुणवत्ता और अनोखे स्वाद के कारण मनोहरलाल जी के द्वारा तैयार नमकीन ओर चिवड़े की शहर में बड़ी माँग रहती थी। हालत यह थी दिनभर में वे जितना माल तैयार करते थे वो कुछ घंटों में ही बिक जाता था। रात को तैयार माल सुबह ग्यारह बजे तक उठ जाता था।
मनोहर लाल जी का जब खुद का बिजनेस नहीं था तब वो जहाँ काम करते थे उनकी गुणवत्ता से वे संतुष्ट नहीं थे। मालिक ज्यादा लाभ कमाने के फेर में माल की क्वालिटी गिराने में कोई झिझक नहीं करते थे। उनका बेसन घटिया था जो आधी कीमत पर बाजार में मिल जाता था। इसी तरह वे घटिया खाद्य तैल का उपयोग भी कर रहे थे। उनके मसाले घटिया थे। जब माल तैयार होता तो देखने में वो अच्छा लगता था पर उसका स्वाद अच्छा नहीं था। मनोहर लाल जी कई बार सेठजी से कह चुके थे कि माल की क्वालिटी में सुधार करो अन्यथा किसी दिन यह धंधा चौपट होने में देर नहीं लगेगी मगर सेठ जी इस पर ध्यान नहीं देते थे। क्योंकि उनका घटिया माल भी धड़ल्ले से बिक रहा था। जिस नमकीन की आधा किलो थैली की लागत मात्र तीस से पैंतीस रुपये की पड़ रही थी उस पर उन्होंने एक सौ बीस रुपये कीमत डाल रखी थी। वो थैली वे बाजार में नब्बे रुपये में बेच रहे थे। ग्राहक यह सोचकर खुश हो रहा था कि उसके तीस रुपये बच रहे हैं। जबकि बीच में जो साठ रुपये थैली पर गोलमाल हो रहा था उस पर किसी का ध्यान नहीं जाता था। मनोहरलाल को इसके विरोध का नतीजा ये मिला की उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया था। नौकरी से निकाले जाने के बाद मनोहर लाल जी ने नमकीन तैयार करने का काम घरेलू उद्योग के तौर पर शुरू किया था। उन्होंने माल की गुणवत्ता और विशिष्ट स्वाद पर विशेष ध्यान दिया था जिसके कारण उनका माल हाथों हाथ बिकने लगा था।
उधर मनोहरलाल जी अपने छोटे से व्यवसाय से भी अच्छी खासी कमाई कर खुश हो रहे व संतुष्ट भी थे।



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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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