रजनी ने तीस साल पहले नर्सिंग में बी एस सी की थी और आज भी वो साढ़े बाइस हज़ार रुपये प्रतिमाह वेतन पर शहर की पिछड़ी बस्ती में स्थित एक निजी जन आरोग्य अस्पताल में नर्स की नौकरी कर रही थी। नौकरी करना उसकी मजबूरी बन गई थी। उसकी उम्र छप्पन वर्ष की हो गई थी परिवार चलाने में उसका यह छोटा सा वेतन बहुत अहम भूमिका अदा कर रहा था।
अस्पताल के मालिक एवं डॉक्टर रमेश राय सुबह शाम तथा दोपहर को कुछ देर के लिए आते थे बाकी समय अस्पताल नर्स एवं रेसिडेन्शियल डॉक्टर के हवाले रहता था। डॉ राय की पत्नी डॉ प्रमिला स्त्री तथा प्रसूति रोग विशेषज्ञ थी। वो थोड़े अधिक समय तक अस्पताल में रहती थीं। रजनी ने बाइस साल पहले इस अस्पताल में छः हजार रुपये प्रतिमाह वेतन से नौकरी की शुरूआत की थी। तीस साल पहले रजनी को बड़े अस्पताल में अच्छे वेतन पर नर्स की नौकरी मिल रही थी। तभी उसके पापा अशोक ने उसकी शादी राजेश जी से कर दी जो कपड़ा मिल में नौकरी करते थे। उनको अच्छी तनख्वाह मिल रही थी यह सोचकर उन्होंने रजनी को नौकरी नहीं करने दी। आठ साल में रजनी के यहाँ बेटी रवीना तथा बेटा रवीश का जन्म हो गया। इधर राजेश की कपड़ा मिल अचानक बंद हो गई। घर की माली हालत बड़ी खराब हो गई थी। घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया था। रजनी भी अब सरकारी नौकरी के हिसाब से ओवर एज हो चुकी थी। तब तक अनेक निजी नर्सिंग कॉलेज खुल गए थे। कई नई नर्सें पास आऊट होकर नौकरी की तलाश कर रही थीं। ऐसे में रजनी को जन आरोग्य में जो नौकरी जिस वेतन पर मिली वो उसने मंजूर कर ली थी। आज तक वही नौकरी चल रही थी। इस बीच डॉ राय ने मुख्य मार्ग पर एक बड़ा अस्पताल खोल लिया था जिसमें उनकी बेटी दामाद बहू बेटा सभी डॉक्टर के रूप में पदस्थ थे। डॉ राय भी अधिकतर समय उस अस्पताल में रुक रहे थे। रजनी को उम्मीद थी कि डॉ साहब उसे नए अस्पताल में अच्छे वेतन पर रख लेंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं। वहाँ उन्होंने सारा नया स्टाफ रखा यहाँ का स्टॉफ यहीं रहने दिया। रजनी का सपना टूटकर बिखर गया था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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