सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: चरवाहा

नंदलाल अठ्ठाइस वर्ष का युवक था वो बकरियाँ पालकर अपनी गुजर बसर कर रहा था उसके पास छत्तीस बकरियाँ थीं और चार बकरे इनकी संख्या घटतो बढ़ती रहती थी इनसे वो हर माह चालीस हजार रुपये कमा रहा था जिससे उसके परिवार का खर्च आराम से चल रहा था आज ही नंदलाल ने एक बकरा और एक बकरी पच्चीस हज़ार रुपये में बेची थी। नंदलाल का घर पक्का था कई छोटे किसान उसके मुकाबले में पीछे थे वे अभी भी कच्चे घरों में रह रहे थे जबकि उसका घर सर्व सुविधा युक्त था उसकी बेटी सानिया तथा बेटा शिवम प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे थे।उसके घर में ट्यूब वेल लगा हुआ था तथा दो पानी के संग्रहण करने भूमिगत टैंक भी बने हुए थे।
नंदलाल ने आठवीं की परीक्षा दी थी तब उसके पिता पूनमचंद का करंट लगने से दुखद निधन हो गया था वे किसी के खेत में मजदूरी से रात में गेंहू की फसल की सिंचाई करने गए थे वहीं उन्हें करेंट लग गया आसपास कोई नहीं था करंट लगने से उनकी रात में ही मौत हो गई सुब्ह जब किसान अपने खेतों की ओर गए तब उन्होंने पूनमचंद जी का मृत शरीर देखा । पोस्ट मार्टम की रिपोर्ट से पता चला कि उनकी मौत करेंट लगने सु हुई है नंदलाल की उम्र उस समय मात्र पन्द्रह वर्ष की थी । वो पढ़ना चाहता था लेकिन पिताजी जो अकेले घर के कमाऊ सदस्य थे उनके निधन ने उसके इरादों पर पानी फेर दिया था उसके पास उस समय बारह बकरियाँ और तीन बकरे थे। नंदलाल ने पढ़ाई छोड़कर बकरियाँ चराना शुरू कर,दिया था शुरू के दो साल उसे आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा फिर दुधारू बकरियों की संख्या बढ़ गई नंदलाल को दूध बेचकर अच्छी आय होने लगी थी जब नंदलाल की उम्र इक्कीस साल की हुई तब तक उसके पास चालीस बकरियाँ हो गई थीं । इसके साथ ही नदी से लगी हुई पाँच एकड़ जमीन भी नंदलाल ने खरीद ली थी उस पूरी जमीन में नंदलाल ने बकरियों का चारा उगा दिया था नंदू की बकरियाँ उस जमीन पर चरती थीं सुब्ह शाम नंदलाल उनका दूध निकालता था । और दो लीटर दूध रखने के बाद बाकी सारा दूध नंदलाल बेच देता था हर दो महीने चार पाँच बकरियाँ बेचने लायक हो जातीं थीं जिन्हें नंदलाल बेचकर अच्छा खासा रुपया कमा रहा था। नंदलाल का बचपन का दोस्त सौरभ भी वहीं रह रहा था। वो एम ए करने के बाद एक प्राइवेट स्कूल में मिडिल के बच्चों को पढ़ा रहा था जिसके सात हजार रुपये तनख्वाह के रूप में उसे मिल रहे थे उसकी आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी उसकी पत्नी रश्मि भी पाँच हजार रुपये प्रतिमाह वेतन पर नर्सरी की टीचर थी। दोनों की तनख्वाह मिलाकर भी बारह हज़ार रुपये हो रहे थे। जिसमें वे जैसे तैसे अपनी गुजर बसर कर रहे थे। जबकि नंदलाल कम पढ़ा लिखा होने के बावजूद दिनेश से चार गुना रुपये अधिक कमा रहा था। और उस पर नौकरी का भी कोई दबाव नहीं था।

*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: शादी के लिए नौकरी

रवीन्द्रसिंह को एक प्राईवेट दवा कंपनी में नौकरी किए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि वह नौकरी छोड़ने का इरादा करने लगा था  लेकिन उसकी  माँ कंचन  का कहना था  जब तक  तेरी शादी न हो जाए  तब तक नौकरी करता रह जब शादी हो जाए तब नौकरी छोड़ना जबकि रवीन्द्र सिंह सोच रहा था कि एक महीना गुजारना मुश्किल हो रहा है कब तो उसकी शादी होगी और कब वो ऐसी नौकरी से पीछा छुड़ाएगा रवीन्द्र सिंह की  उम्र पैंतीस वर्ष की होने जा रही थी  और वो अभी तक कुँवारा  था कंचन जी का वह इकलौता लड़का था  उनकी दो लड़कियाँ थीं दोनों रवीन्द्द से बड़ीं थीं दोनों की शादी हो गईं थी दोनों के बच्चे   कोई छठी में तो कोई सातवीं में तो कोई आठवीं में पढ़ रहा था।  कंचन जी कस्बे के  एक सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी कर रही थीं  उनके पति सुरेन्द्रसिंह  सरकारी दफ्तर में बाबू थे  सरकारी काम से जब वे कहीं जा रहे थे तब  एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था।  जब रवीन्द्र एक साल का था तब उसके पिता का निधन हुआ था उसकी दोन...