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कहानी: अपने घर में

विकासखण्ड में बड़े बाबू के पद से सेवानिवृत हुए राकेश गुप्ता जी ने पूरे एक साल बाद अपने खुद के नए मकान में आज गृहप्रवेश किया था। इस अवसर पर उन्होंने एक छोटा सा आयोजन भी किया था। आज वे बहुत खुश थे उनका चेहरा खुशी से दमक रहा था। उन्होंने अपना सरकारी क्वार्टर भी खाली कर दिया था।
राकेश गुप्ता जी ने विकास खण्ड कार्यालय में पूरे चौंतीस साल तक नौकरी की थी। नौकरी के शुरू में ही उन्हें सरकारी क्वार्टर मिल गया था। उसी में उनकी शादी हुई थी तथा वे अपनी पत्नी शीला को ब्याहकर लाए थे। उनके एक बेटा रोहित तथा एक बेटी रुचि थी दोनों की शादी उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति के पूर्व ही कर दी थी। बेटी अपनी ससुराल में अपने पति के साथ खुशीपूर्वक रह रही थी। रोहित और उसकी पत्नी रिया उनके साथ ही रह रहे थे। रोहित प्राइवेट में जॉब कर रहा था तथा रिया एक निजी स्कूल में शिक्षक के पद पर कार्यरत थी। राकेश बाबू ने अपनी कमाई गृहस्थी की गाड़ी चलाने में लगा दी थी। उनके पास कभी इतने रुपये नहीं जुड़ सके थे कि वे अपना मकान बना सकें। बीस साल पहले उन्होंने पंचवटी काॅलोनी में बारह सौ वर्ग फीट का एक आवासीय भूखण्ड लोन से खरीद लिया था। उसकी कीमत आज बीस गुनी बढ़ गई थी। राकेश बाबू ने रिटायर मेन्ट के पहले ही मकान बनाने की सभी तैयारियाँ शुरू कर दी थीं। जैसे ही वे रिटायर हुए तो उन्होंने ग्रेच्यूटी तथा फंड का पैसा मिलते ही मकान निर्माण का कार्य प्रारंभ कर दिया था। इसके लिए उन्हें बुढ़ापे में बहुत मेहनत करना पड़ रही थी। लड़के को अपनी नौकरी से ही फुर्सत नहीं थी। इधर राकेश जी को सरकारी क्वार्टर खाली करने को कहा जा रहा था। उनके क्वार्टर पर उन कर्मचारियों की नजर थी जो शहर में किराये के मकान में रह रहे थे। राकेश बाबू को परा एक वर्ष लग गया अपना मकान बनवाने में। उनका मकान थ्री बी एच के था, मकान तो अच्छा बना था लेकिन उसमें उनका बहुत सारा रुपया खर्च हो गया था। फिर भी उनके मन को बड़ा संतोष था। यह मकान उनके सरकारी क्वार्टर से काफी बड़ा था जिसमें वे अपने बहू बैटे के साथ आराम से रह सकते थे। आज उन्होंने अपने मकान में गृहप्रवेश भी कर लिया था।



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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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