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कहानी: विश्वासघात

अनाज व्यापारी रामरतन आज भले ही धन संपन्न हों लिकन पाँच वर्ष पूर्व तक वे खेती करत थे। उनके पास चालीस एकड़ जमीन थी। उस जमीन पर रामरतन जी ने पूरे पन्द्रह साल खेती की थी। आखिर हरिचरण जिसे वो अपना पिता समझते थे उनके मरने के बाद पता चला कि वे उनके असल पिता नहीं थे सौतैले थे। उनके छोटे भाई के वे सगे पिता थे। उनकी माँ हीरा देवी ने भी उनसे ये बात छिपाई थी। कानूनन पूरी जमीन का मालिक उनका छोटा भाई अमित था। सारी जमीन अमित के नाम हो गई थी। और रामरतन जी को उस जमीन से बेदखल होना पड़ा था।
रामरतन जी की उम्र पैंतीस साल की हो गई थी। उनके दो बच्चे सोहन और सोनम को साथ लेकर वे वीरगंज में किराये का मकान लेकर रहने लगे थे। उन्हें दुख इस बात का था कि उनकी सगी माँ ने भी उनसे इतनी बड़ी बात छिपाई थी। सौतैले पिता हरिचरण ने भी यह जाहिर नहीं होने दिया था कि वो सौतेले हैं। वे उस जमीन को अपनी समझकर मेहनत करते रहे थे। रामरतन जी ने पूरे पन्द्रह साल उस जमीन पर इतनी मेहनत की थी कि कभी बंजर माने जाने वाली वो जमीन अब सबसे उपजाऊ बन गई थी। खेत पर चालीस लाख का मकान उन्होंने ही बनवाया था। पन्द्रह लाख रुपये के कृषियंत्र थे, ट्रेक्टर था जो रामरतन की मेहनत की कमाई से जुटा था। सब पर अमित का कब्जा हो गया था। जबकि अमित ने कभी खेती का काम नहीं किया था। मेहनत रामरतन जी करते और उनकी कमाई को उनका सौतैला भाई खुले हाथों से उड़ाता था। पिता के मरने के बाद अमित को तो सब कुछ बना बनाया मिल गया था लेकिन रामरतन जी के पास कुछ नहीं था। रामरतन जी हायर सेकेण्डरी पास थे। काॅमर्स पढ़े थे इसलिए हिसाब किताब में निपुण थे। वे अपने सहपाठी हरि गुप्ता के पास आए और कहा कि कोई काम हो तो बता दो मैं कर लूँगा मेरे पास इस समय फूटी कौड़ी भी नहीं है। हरि गुप्ता उन्हें अपने साथ लालाराम के पास ले गए। लालाराम अनाज व्यापारी थे उन्हें मुनीम की जरूरत थी। रामरतन जी को ये काम आता था। उन्हें लालाराम जी की दुकान पर काम मिल गया था। रामरतन जी के पास और भी पाँच अनाज व्यापारियों के लेखा-जोखा का काम आ गया था जिसे वे ईमानदारी से कर रहे थे। इस काम से उनकी आय चार गुना बढ़ गई थी। छः महीने में उन्होंने दिनरात मेहनत कर चार लाख रुपये जोड़ लिए थे। यह रूपये उन्होंने रजिस्ट्रेशन और लायसेन्स के लिए बचाए थे। इस तरह रामरतन जी ने भी मंडी में जाकर सारी औपचारिकताएँ पूरी कर लायसेन्स बनवा लिया था। अब वे भी शहर के अनाज व्यापारी बन गए थे। पाँच साल में रामरतन जी बड़े अनाज व्यापारी बन गए थे जबकि उनका छोटा भाई अमित अब मात्र एक साधरण किसान बनकर रह रहा था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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