निराश्रित महिला आश्रम की संचालिका साध्वी जितनी सरल मधुर और शाँत दिखाई देतीं थी उनका उतना ही कड़वा अतीत था जिसे वे भूल चुकी थीं। इसके जिम्मेदार सभी लोगों को उन्होंने दिल से माफ कर दिया था अब उनके मन में किसी के प्रति कोई मलाल नहीं था। उनके साथ रह कर पिछले पन्द्रह वर्ष से काम कर रही सरोज उनके विषय में बहुत कुछ जानती थी। वो पूछने पर उनके अतीत के विषय में सहजता से सब कुछ बता देती थी जिसे सुनकर लोगों की मिली जुली प्रतिक्रिया होती थी। शाँति देवी की उम्र इस समय पचास वर्ष की थी। इस आश्रम की स्थापना उन्होंने पन्द्रह वर्ष पूर्व की थी। उनके आश्रम में चार सौ निराश्रित महिलाएँ थीं उनमें से अधिकाँश आत्म निर्भर थीं। जो कई प्रकार के काम कर धन कमाती थीं। आश्रम का अपना बिक्री केन्द्र भी था जहाँ दिनभर खरीददारों की भीड़ लगी होती थी।
सरोज ने एक दिन बताया था कि शाँति जी की शादी अठारह वर्ष की आयु में शंकरलाल के साथ हुई थी। शंकरलाल जी के पिता उमाकाँत का निधन हो गया था। शंकरलाल के ऊपर माँ तथा अपनी छोटी बहन और भाई की जिम्मेदारी थी। जिसका निर्वहन वो भली प्रकार से कर रहे थे। उस समय शाँति देवी आज की तरह नर्मदिल की नहीं थीं। वे एक मतलबी महिला थीं उन्हें घर में नन्द सास का साथ बिल्कुल पसंद नहीं था। उनकी नन्द सास से उनकी अदावत चलती रहती थी। शंकरलाल ने कुछ दिन तक तो यह सब सहन किया फिर तँग आकर शाँति देवी से कहा कि वो अपनी माँ भाई और बहन को कभी अपने से अलग नहीं कर सकता। इस बात से नाराज होकर शाँति देवी मायके में आ गई थीं। फिर वे शंकरलाल के पास कभी नहीं आईं थी। आखिर शाँति देवी का तलाक हो गया। इसके दो साल बाद शाँति देवी की शादी उनके पिता ने देवेन्द्र से कर दी। देवेन्द्र उग्र स्वभाव का इंसान था उसने शांति देवी को हिदायत दे रखी थी कि वो अपने मायके वालों से कभी वास्ता नहीं रखेगी। फिर भी शाँति देवी माँ से रोज ही बात करती थीं। जब देवेन्द्र को पता चलता तो वो शाँति देवी के साथ मारपीट तक कर देता था। एक दिन इसी बात को लेकर शाँति देवी की देवेन्द्र से जोरदार बहस हो गई। देवेन्द्र को गुस्सा आ गया तो उसने शाँति देवी की इस कदर पिटाई की कि वे लहूलुहान हो गईं। ऐसी अवस्था में ही उसने शाँति देवी को घर से निकाल दिया था। शाँति देवी फिर मायके आ गईं। देवेन्द्र से भी उनका तलाक हो गया था। शाँति देवी ने तीन वर्ष तक निर्मला स्वयं सेवी समिति में नौकरी कर ली। तीन साल तक नौकरी करने के बाद शाँति देवी ने नौकरी छोड़कर इस आश्रम की स्थापना की थी। इसके साथ ही उन्होंने अपने आपको पूरी तरह बदल दिया था। अब अधिकतम समय वो सबका भला करके बिता रही थीं और आज इतने बड़े आश्रम की संस्थापिका थीं।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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