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कहानी: मजबूरी का फायदा

रतनसिंह को पीलिया की बीमारी हो गई थी जिसका इलाज के नाम पर उसके अपने ही सगे भाई धीरप सिंह ने पाँच लाख रुपये हड़प लिए थे। बाद में उन पैसों से दुकान खोल ली थी। बीमारी के बाद रतनसिंह की आर्थिक स्थिति डगमगा गई थी। उनकी पत्नी दूसरों के घर के बर्तन माँझकर घर का खर्च चला रही थी। धीरप सिंह ने तो इलाज के नाम से भाई को कंगाल बनाकर उससे कन्नी काट ली थी। रतनसिंह को बाद में भाई की साजिश का पता चला था। लेकिन वे क्या कर सकते थे।
धीरप सिंह रतन सिंह से दो साल छोटा था। उनके पिताजी रामसिंह खेतिहर मजदूर थे। रतनसिंह ने गाँव के सरकारी स्कूल में आठवीं तक की पढ़ाई की थी। इससे आगे पढ़ाने में रामसिंह ने अपनी असमर्थता जताई थी। हारकर रतन सिंह को अपनी पढ़ाई छोड़ना पड़ी थी। वो पटेल दुर्गा सिंह के पशु चराने के काम में लगा दिया गया था। धीरप सिंह शुरू से ही आवारा था। स्कूल में नाम तो उसका भी लिखाया था पर वो कभी स्कूल नहीं गया था। इसके बाद भी वो माँ बाप का चहेता था। पिताजी ने रतनसिंह की शादी करके उसे घर से अलग कर दिया था। रतनसिंह रोज सायकिल से शहर जाते तथा वहाँ भवन निर्माण कार्य में मजदूरी करते थे। तेज दिमाग होने के कारण उन्होंने राज मिस्त्री का काम सीख लिया था। इससे उनकी मजदूरी दोगुना हो गई थी। ये मजदूरी खेतिहर मजदूर के हिसाब से तीन गुनी अधिक हो गई थी। शहर में रतनसिंह की कई लोगों से दोस्ती हो गई थी। रतन सिंह को शासन की ग्रामीण आवास योजना से ढाई लाख रुपये मिले थे। उसमें बाकी रुपये अपनी तरफ से मिलाकर रतनसिंह ने पक्का मकान बना लिया था जिसमें वे सब सुखपूर्वक रह रहे थे। रतनसिंह मिस्त्री के साथ ही ठेकेदारी का काम भी करने लगा था। उससे उसने खूब पैसा कमाया था। रतन सिंह की पत्नी पढ़ी लिखी नहीं थी। उनके एक बेटी निशा और एक बेटा नवीन थे। दोनों की उम्र अभी तीन साल तथा छः साल थी। दूसरी ओर धीरप ने पिताजी के मरने के बाद उनका सारा जमा रुपया खर्च कर दिया था, मकान भी बेच दिया था। रतन सिंह को दूषित पानी का सेवन करने से पीलिया हो गया था जिसका इलाज वो गाँव के झोला छाप डॉक्टर से करा रहा था लेकिन कुछ आराम नहीं मिल रहा था। रतनसिंह के बीमार पड़ने से बहुत सारी परेशानियाँ पैदा हो गईं थीं। कोई काम करने वाला नहीं था। रतन सिंह के मित्र मोती सिंह ने उनको इलाज के लिए शहर ले जाने का इरादा किया था तभी धीरप सिंह को किसी ने सारी बात बताई। धीरप एक कुटिल इंसान था। उसने भाई की बीमारी का फायदा उठाने का इरादा कर लिया था। धीरप सिंह उन्हें शहर के एक निजी अस्पताल में ले आया था यहाँ उसकी अस्पताल प्रबंधन से साँठ गाँठ थी। रतनसिंह की पत्नी अनपढ़ थी। धीरप सिंह ने इलाज के नाम से पैसे की लूट शुरू कर दी थी। दस दिन का अस्पताल का बिल बारह लाख रुपये का आया था जिसमें रतनसिंह की सारी जमा पूँजी लग गई थी। इलाज में तीन लाख रुपये खर्च हुए थे। लेकिन नौ लाख रुपये धीरप सिंह ने और अस्पताल के स्टाफ ने आपस में बाँट लिए थे। भाई की साजिश की खबर लगने पर रतनसिंह बहुत उदास हो गए थे। पर उनका मन कह रहा था कि वो खूब मेहनत कर खुद को घाटे से उबार सकता है। भाई पर उसने कभी दुबारा  भरोसा न करने की कसम खा ली थी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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