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कहानी: सहारा

नीरज कन्सट्रक्शन के मालिक नीरज गुपता आज शहर के धनाढ्य लोगों में गिने जाते लेकिन वे पन्द्रह साल पहले तक एक बिल्डर के यहाँ सिविल इंजीनियर के पद पर पन्द्रह हज़ार रुपये प्रति माह वेतन पर काम करते थे। लेकिन सोमवती अमावस्या पर होशंगाबाद में मिली सत्तर वर्षीया शारदा देवी ने उन्हें नौकर से सेठ बना दिया था। वे पूरे दस वर्ष तक नीरज के यहाँ नीरज की दादी बनकर रहीं थीं। नीरज ने उन्हें सहारा दिया था जिसके बदले मरने से पहले वे अपनी पूरी जमीन जायदाद नीरज के नाम कर गईं थीं। तब नीरज को पता चला था कि उसने जिन्हें बेबस गरीब बेसहारा समझकर सहारा दिया था वो करोड़ों रुपये की जमीन की मालिक थीं। बारह करोड़ रुपये तो उनके बैंक में जमा थे सात करोड़ रुपये के उनके पास जेवरात थे वे सब नीरज को दे गईं थीं।
शारदा देवी के निधन के बाद पता चला कि वे महानगर से लगी पच्चीस एकड़ जमीन की मालिक थीं। उनके पति  सोहनलाल शेरपुर गाँव के सरपंच रहे थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। शारदा देवी अकेली करोड़ों की संपत्ति की स्वामिनी थी। इसके कारण कई मतलबी रिश्तेदार उनके हमदर्द बनकर उनकी जायदाद हड़पने के प्रयास में थे। उनके बनावटी व्यवहार से वे तंग आ गईं थीं। उनके रिश्तेदारों में वे किसी को भी इस योग्य नहीं समझतीं जिसे वे अपनी जायदाद देकर जाएँ। वे इसी सोच में डूबी रहती थीं। गाँव के पंडित रामनारायण जब उनके घर फेरा करने आए तब उन्होंने बताया कि कल सोमवती अमावस्या है इस अवसर पर तीर्थ दर्शन एवं पवित्र नदियों मे स्नान का बहुत पुण्य है। तो वे बिना किसी को बताए होशंगाबाद में नर्मदा स्नान को आ गई थीं। स्नान के बाद जब वे मंदिर में दर्शन के लिए लाइन में लगीं तो देखा कि बड़ी भीड़ है। पूरे तीन घंटे उन्हें लाइन में लगे हुए हो गए थे कुछ खाया भी नहीं था बड़ी कमजोरी हो रही थी तभी भगदड़ मच गई। कई लोग नीचे गिर गए और लोगों के पाँवों से कुचले गए। शारदा देवी भी भीड़ के धक्के से गिर गई थीं और गिरकर बेहोश हो गई थीं। जब उन्हें होश आया तो उन्होंने देखा कि एक पच्चीस वर्षीय युवक जिसका नाम नीरज है वो उनकी देखभाल कर रहा है। बाहर लोग बात कर रहे थे कि भगदड़ से चार लोगों की मौत हो गई है। पन्द्रह लोगों की हालत गंभीर है लेकिन शारदा देवी सही सलामत थीं। इसका कारण यह था कि जैसे ही शारदा जी गिरीं नीरज ने उन्हें फौरन उठा लिया था जिससे वे भीड़ के रौंदे जाने से बच गई थीं। नीरज उनसे कह रहा था अब कैसी तबियत है दादी? नीरज के शब्दों से अपनापन झलक रहा था वे बोलीं ठीक हूँ बेटा। नीरज ने कहा दादी आप किनके साथ आई थीं? तब उन्होंने कहा था इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है। अकेली ही चली जाती हूँ जहाँ जाना होता है। नीरज ने कहा था आज से आप किसी से कभी ये मत कहना कि इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है। आप मेरी दादी हो और हमेशा रहोगी। यह कहकर वे शारदा देवी को अपने घर ले आए थे। उनकी पत्नि नीना ने भी उनका स्वागत किया था। नीना और नीरज ने परिवारजनों के प्रबल विरोध के बाद भी प्रेम किया था। नीना गर्भवती थी शारदा देवी ने बहुत आग्रह पर उनके साथ रहना मंजूर कर लिया था। पूरे दस साल तक नीरज के घर उनको रहना पड़ा था। नीरज ने उन्हें अपनापन दिया था और निस्वार्थ भाव से सेवा की थी। अस्सी वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ था। उनके निधन के बाद महानगर के वकील कपिल ने नीरज से बात की। उन्होंने पच्चीस एकड़ के फार्म हाऊस सहित करोड़ों की संपत्ति नीरज के नाम कर दी थी। जिसके कारण आज नीरज नौकर की हैसियत खत्म कर बड़ी कंपनी का मालिक बन सका था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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