गुलाबसिंह ने बीए करने के बाद पूरे दस साल तक पेपर मिल में नौकरी की थी। बाद में पेपर मिल बंद होने पर उसकी नौकरी छूट गई थी और वो पूरी तरह बेरोजगार हो गया था। ऐसे में जो दस वर्ष तक उसने दो सौ रुपय महीने की बचत की थी वो उसके बड़े काम आई थी। आज उसकी बदौलत उसकी शहर में अपनी इलेक्ट्रानिक्स की दुकान थी।
बात बारह वर्ष पुरानी है तब गुलाब सिंह की नौकरी पेपर मिल में लगी ही थी। उसका एक सहपाठी दोस्त था दिनेश वो एक फाइनेन्स कंपनी में काम करता था। उसने गुलाबसिंह से कहा या कि वो अपनी तनख्वाह से छोटी सी बचत भी करेगा तो आगे चलकर बड़ी काम आएगी। गुलाब सिंह को बारह हजार रुपये महीना वेतन मिलता था। उसने दिनेश से कहा तेरा मन रखने के लिए मैं दो सौ रुपये प्रतिमाह की बचत करने को तैयार हूँ। दिनेश बोला ठीक है दो सौ रुपये ही सही। गुलाबसिंह ने अपना वादा निभाया था पूरे दस साल तक वो दो सौ रुपये प्रतिमाह दिनेश को देता रहा। उसने दिनेश से कभी ये नहीं पूछा कि वो इन रुपयों का क्या कर रहा है। उसकी तनख्वाह बढ़कर चालीस हजार हो गई तब भी उसने दो सौ रुपये से ज्यादा दिनेश को कभी नहीं दिए थे। इधर मिल बंद हो जाने से गुलाब सिंह की हालत खराब हो गई थी। पैसे पैसे को वो मोहताज हो गया था। उसको छः महीने का वेतन भी नहीं मिला था। गुलाब सिंह के पास गाँव में एक मकान था उसने सोचा कि उस मकान को बेचकर वो शहर में दुकान खोल लेगा। लेकिन गाँव के मकान के कोई तीन लाख रुपये से ज्यादा देने को तैयार नहीं हुआ। तीन लाख रुपये में तो दुकान खोल पाना बहुत मुश्किल था। ऐसे में दिनेश उसके पास आया और बोला अब देख तेरी छोटी बचत का कमाल। तुझे कौन सी दुकान लेना है दिनेश ने कहा जो पन्द्रह बाई बीस फीट की दुकान है वो लेना है। और कितने पैसे कारोबार शुरू करने के लगेंगे। गुलाब सिंह ने कहा कम से कम पच्चीस लाख तो लगेंगे ही सही। दिनेश ने कहा दुकान कितने में मिल रही है गुलाब सिंह बोला पचास लाख रुपये में, सब मिलाकर पिचहत्तर लाख रुपये लगेंगे। दिनेश ने कहा बस इतने ही गुलाब सिंह को बड़ा अचरज हुआ पिचहत्तर लाख रुपये कोई मामूली रकम तो थी नहीं। दिनेश ने कहा तेरे वे रुपये मैंने शेयर मार्केट में लगा दिए थे। आज तेरे पास पूरे एक करोड़ दस लाख रुपये का बैलेन्स है। गुलाब सिंह को दिनेश की बात पर विश्वास ही नहीं हुआ। लेकिन जब दिनेश ने विस्तार से उसे सारी बात बताई तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने पिचहत्तर लाख रुपये ही लिए और उससे अपनी दुकान खोल ली बाकी पैसे उसने शेयर मार्केट में ही लगे रहने दिए थे। मिल बंद होने से उसके जैसे सैंकड़ो लोग बेकार हो गए थे। सबकी हालत खराब थी पर ऐसे में भी गुलाबसिंह के चेहरे पर चमक थी। यह सब उसकी छोटी सी बचत का चमत्कार था जिसमें दिनेश का बहुत बड़ा योगदान था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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