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कहानी: मार्केटिंग

वनाँचल में स्थित वीरपुर ग्राम में राघव ने मार्केटिंग से बहुत रुपया कमाया था। फार्मेसी में डिग्री हासिल करने के बाद उसने वीरपुर गाँव में ही अपना प्लान्ट लगाया था जिसमें वो आयुर्वेदिक दवाएँ बनाकर उनकी पैकिंग कर मार्केटिंग के जरिए खूब पैसा कमा रहा था। वीरपुर गाँव के और भी नवयुवक थे जो उच्च योग्यताधारी थे। अनेक एम बी ए, एम सी ए भी थे पर उनमें से अधिकाँश बेरोजगार। दूसरी ओर राघव खूब रुपया कमा रहा था। अस्सी लोगों को उसने रोजगार भी दे रखा था। उसके पिताजी रामकिशन जलाऊ लकड़ी बेचकर अपना गुजारा करते आज तीस एकड़ जमीन के मालिक थे और उसमें जड़ी बूटी का उत्पादन कर रहे थे।
आठ वर्ष पूर्व राघव फार्मेसी में डिग्री लेने के बाद जब वीरपुर आया था तब उसके साथ के युवकों ने उसकी खिल्ली उड़ाते हुए कहा था कि थोड़े दिन बाद इसका भी जोश ठंडा पड़ जाएगा। बेरोजगारी इसे तोड़कर रख देगी। मगर वे जानते नहीं थे कि राघव मार्केटिंग एक्सपर्ट है जो मिट्टी से भी रुपया कमा सकता है। राघव की आते ही गाँव के बेरोजगार युवकों से तीखी बहस हो गई थी। राघव का कहना था आगे बढ़ने के अवसर बहुत हैं और हमारे आसपास ही हैं। इस पर सभी ने राघव जी को चुनौती देते हुए कहा कि लकड़ी का एक गठ्ठर डेढ़ सौ रुपये में बिकता है तुम उसे एक हजार रुपये में बेचकर बताओ तो मान जाएँगे। राघव ने लकड़हारे से डेढ़ सौ रुपए में वो गठ्ठा ले लिया। उसमें आम और पलाश की लकड़ियाँ थीं। राघव बाजार से थैली लाया लकड़ी के अपने हिसाब से टुकड़े कर उन्हें थेली में रखना शुरू किया। ऐसी डेढ़ सौ थैलियाँ उसने तैयार कर ली थीं। और पूजा की दुकान पर हवन समिधा बताकर आठ रूपये प्रति पैकेट के दर से देकर आ गया। इसके उसे पूरे बारह सौ रुपये मिले। यह देख वे युवक हैरत में पड़ गए थे। तब भी उन्होंने हार नहीं मानी वे बोले अबकि बार पत्ती से धन कमाना है। राघव ने चुनौती स्वीकार कर ली थी। राघव जी ने दो बोरे पलाश के पत्ते तोड़कर भर लिए और सायकिल से शहर आ गया। वे पत्ते उसने फुल्की चाट वाले को दे दिए और चौदह सौ रुपये में बेच दिया। अबकि बार उन्होंने मिट्टी से धन कमाने की बात कही। राघव ने इसे स्वीकार कर लिया था। राघव ने वो मिट्टी सिर के बाल धोने वाली के लेप बना पन्द्रह सौ रुपये में बेच दी थी। उन सभी ने राघव से हार मान ली थी। राघव ने उसी गाँव में देशी दवाओं के निर्माण का संयंत्र लगाया था और आज गाँव का सबसे संपन्न व्यक्ति बन गया था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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