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कहानी: फौजियों का आत्म बलिदान

अजीत नगर में देश पर आत्म बलिदान करने वाले लेफ्टीनेन्ट परमवीर चक्र विजेता अजीत सिंह का समाधि स्थल था जिसमें हर वर्ष भव्य मेले का आयोजन किया जाता था जिसमें तीन दिन तक दूर दूर से लोग आकर उनकी समाधि के दर्शन करते थे तथा उनके जैसे देश भक्त बनने की कामना करते थे।
देश ने पिछला युद्ध उनको सूझ बूझ तथा अपने साथ आठ सैनिकों के आत्म बलिदान के परिणाम था। बात उन दिनों की है जब दुश्मन देश से युद्ध चल रहा था। भारतीय सैनिक उन पर भारी पड़ रहे थे इसलिए वे बौखलाए हुए थे और भारतीय सेना को भारी क्षति पहुँचाना चाहते थे। लेफ्टीनेन्ट अजीत सिंह दुश्मन की चौकियाँ फतह करते हूए दुश्मन देश की सीमा में बहुत अंदर तक आ गए थे और दुश्मन के हजारों सैनिकों के बीच घिर चुके थे। उनके पास का गोला बारूद खत्म हो गया था। मदद मिलने की कोई गुंजाइश नहीं थी तभी लाँस नायक सुधीर ने देखा कि दुश्मन का सैनिक उनकी तरफ हैंड ग्रेनेड फेंकने वाला है। सुधीर ने बिजली की फुर्ती से उसपर छलाँग लगा दी। वो ग्रनेड वहीं फट गया सुधीर के साथ दुश्भन के सत्रह सैनिक काल के गाल में समा गए। दुश्मनों के बीच कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया। इसका लाभ लेकर अजीत सिंह ने अपने कमाँडर रोशन सिंह जी से संपर्क करा और कहा कि सर हमारे पास वक्त नहीं है हम सात लोग हैं चारों तरफ से दुश्मनों से घिर चुके हैं। आप हमारी लोकेशन ट्रेक कर हमें उड़ा दीजिए। लेकिन उन्होंने ऐसा करने साफ इंकार कर दिया था। कहा था हम जल्दी आ रहे हैं तब अजीत सिंह ने अपने असिस्टेण्ट आशीष से संपर्क किया जो दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व कर रहा था। उसे उन्होंने अपना अंतिम आदेश उन्हें तबाह करने को दिया। आशीष ने दुखी मन से इसका पालन किया। अजीत सिंह ने देखा दुश्मनों के दस हजार सैनिकों ने उन्हें घेर लिया है। वे कुछ कर पाते तभी एक जोरदार धमाका हुआ और उन सात सैनिकों के साथ पूरे दस हजार सैनिक मारे गए। जब रोशन सिंह वहाँ पहुँचे तो देखा लाशों के ढेर लगे हुए हैं। दुश्मनों का मनोबल पूरी तरह टूट चुका था। रोशन सिंह के पास भी कुल बीस सैनिक थे जिनके सामने दुश्मनों के पाँच हजार सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया था। इस खबर ने भातीय सैनिकों मे खूब जोश भर दिया था। शत्रु देश ने एक बार फिर अपनी हार मान ली थी। अजीत सिंह और उनके साथियों का आत्म बलिदान व्यर्थ नहीं गया था। यही कारण था कि उनकी अंतिम यात्रा में अपार जन समूह उमड़ पड़ा था। पूरा देश उनका ऋणी था। तभी उन्हें और सुधीर को परमवीर चक्र दिया गया था बाकी सभी सैनिकों को भी शौर्य पदक दिए गए थे।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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