सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: शाला भवन की पुताई

रमेश चन्द्र जी सेमल गाँव की माध्यभिक शाला के प्रभारी थे उन्हें अधिकारियों के द्वारा सख्त निर्देश मिले थे कि छब्बीस जनवरी से पहले शाला भवन की पताई हो जाना चाहिए अन्यथा कार्यवाही की जाएगी वे पिछले आठ दिनों से परेशान थे पुताई में उनकी जेब से पूरे अठारह हज़ार रुपये लग गए थे। शासन द्वारा पुताई के लिए नौ हज़ार रुपये की राशि दी गई थी जबकि पुताई में पूरे सत्ताइस हजार रुपये खर्च हुए थे। 
रमेशचंद्र जी जबसे शाला प्रभारी बने हैं तबसे हर महीने उनकी जेब से पाँच से सात हजार रुपये खर्च हो रहे हैं जिनकी कभी भरपाई नहीं होती इसके बाद भी आए दिन स्कूल में निरीक्षण करने आए अधिकारी उन्हें डरा धमका कर चले जाते हैं जबकि वे उन्हें अपनी जेब से चाय नाश्ता कराते हैं तब भी उनका व्यवहार ठीक नहीं रहता इसके बाद भी उनकी निरीक्षण जी में कोई सकारात्मक टिप्पणी लिखकर नहीं जाते।
शिक्षण सत्र समाप्ति की ओर जाने पर अब शाला निधि के नाम से शासन ने मात्र पच्चीस हज़ार रुपये वेन्डरों के खाते मे जमा किए थे। उनमें से दो हज़ार रुपये अधिकारियों ने वेन्डरों से सीधे हड़प लिए थे । पैसे जमा करने के तुरंत बाद शाला भवन की पुताई के निर्देश जारी हुए थे पुताई के लिए नौ हजार रुपये की राशि वेन्डर के खाते में जमा हुई थी जो अपर्याप्त थी। इसके बाद जो निर्देश थे उसमें ब्रांडेड कम्पनी के कलर का उपयोग होना था वार्निश भी अच्छी क्वालिटी का होना जरूरी था जबकि पुताई करने वाले ठेकेदार ने चौदह हजार रुपये तो पुताई के काम के ही ले लिए थे। रमेशचंद्र जी स्कूल की सफाई एवं शौचालयों की सफाई के पाँच हजार रुपये महीने अपनी जेब से दे रहे थे वेन्डरों से अगर सामान के बदले नगद राशि लो तो वो चालीस परसेन्ट राशि काटकर दे रहे थे। रमेश जी ने उनसे सामान लेना ही बेहतर,समझा था एक बार मीटिंग में रमेश जी ने इस विषय में अधिकारी से बात करना चाही तो अधिकारी ने उल्टे उन्हें ही डाँट लगा दी कहा बहुत नेतागिरी का भूत चढ रहा है बाकी और किसी को तो कोई शिकायत नहीं है। ज्यादा बोलोगे तो नौकरी करना भूल जाओगे अभी सस्पेण्ड करा देंगे और असंचयी प्रभाव से दो वेतनवृदूधि रुकवा देंगे तो कैसा लगेगा। इस बात पर उनके ही साथियों ने रमेश जी को चुप करा दिया एक बोले अधिकारी से बहस करना हितकर अभीनहीं है। उसकी तो हाँ में हाँ मिलाई जाए उसी में अपनी भलाई है। सुनकर रमेश जी चुप हो गए थे। फिलहाल उनको अठारह हजार का चूना तो लग ही चुका था। अभी अप्रेल तक स्कूल लगना थे उसमें भी उन्हें अपनी जेब से ही खर्च करने थे।



******
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: शादी के लिए नौकरी

रवीन्द्रसिंह को एक प्राईवेट दवा कंपनी में नौकरी किए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि वह नौकरी छोड़ने का इरादा करने लगा था  लेकिन उसकी  माँ कंचन  का कहना था  जब तक  तेरी शादी न हो जाए  तब तक नौकरी करता रह जब शादी हो जाए तब नौकरी छोड़ना जबकि रवीन्द्र सिंह सोच रहा था कि एक महीना गुजारना मुश्किल हो रहा है कब तो उसकी शादी होगी और कब वो ऐसी नौकरी से पीछा छुड़ाएगा रवीन्द्र सिंह की  उम्र पैंतीस वर्ष की होने जा रही थी  और वो अभी तक कुँवारा  था कंचन जी का वह इकलौता लड़का था  उनकी दो लड़कियाँ थीं दोनों रवीन्द्द से बड़ीं थीं दोनों की शादी हो गईं थी दोनों के बच्चे   कोई छठी में तो कोई सातवीं में तो कोई आठवीं में पढ़ रहा था।  कंचन जी कस्बे के  एक सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी कर रही थीं  उनके पति सुरेन्द्रसिंह  सरकारी दफ्तर में बाबू थे  सरकारी काम से जब वे कहीं जा रहे थे तब  एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था।  जब रवीन्द्र एक साल का था तब उसके पिता का निधन हुआ था उसकी दोन...