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कहानी: फीकी मकर संक्रान्ति

रागिनी का इस बार का मकर संक्रान्ति का पर्व फीका मना हमेशा तीन दिन से अधिक मायके में रहने वाली शाम को ही दुखी मन से अपने घर आ गई थी माँ के निधन होने के कारण ऐसा हुआ था बाकी तो सब थे एक अकेली माँ ही तो नहीं थी पर उनके न होने ने रागिनी का त्यौहार फीका कर दिया था।
रागिनी को पिछली मकर संक्रान्ति की याद आ रही थी जब उसकी माँ ने कई प्रकार के लड्डू बनवाए थे रागिनी और उसके दोनों बच्चों के लिए उनकी पसंद के कपड़े दिलवाए रागिनी को विदा करते समय पाँच हज़ार रुपये दिए थे साथ में बहुत सारा सामान भी भाभी भैया ने भी अच्छा व्यवहार किया था रागिनी का भतीजा मयंक तथा भतीजी महक ने भी उससे खूब बातें की थी वो बड़ी खुशी से तीन दिन मायके रहकर आई थी। माँ का पिछले वर्ष अगस्त में डेंगू के कारण दुखद निधन हो गया था माँ के देहावसान के अभी छः महीने ही हुए था मगर उसके मायके में सब कुछ बदल गया था रागिनी के पिता जगदीश बेटे बेटी में भेद करते थे माँ के जाने के बाद उन्होंने सारे जेवर और नगदी बहू बेटे को दे दी थी मकान अपने जीते जी बेटे के नाम कर दिया था पाँच एकड़ जमीन बहू के नाम कर दी थी दुकान भी अपने लडके को दे दी थी। अब जगदीश घर पर ही रहते थे और सब्जी भाजी लाना बच्चों को स्कूल,लाना ले जाना यही उनके काम रह गए थे माँ के मरने के बाद रागिनी ने अपने आपको इसके लिए तैयार कर लिया था कि अब उसकी मायके में उतनी पूठ नहीं रहेगी मगर उसके साथ इतना बुरा बर्ताव किया जाएगा इसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी आज सुब्ह जब वो मायके आई थी तो माँ की याद कर के रोई भी थी तथा मायके आकर खुश भी हुई थी वो अपने साथ मिठाई का डिब्बा भी लाई थी। लेकिन दोपहर में जो उसे खाना दिया गया वो बेस्वाद खिचड़ी थी। पिता जगदीश ने भी उससे अधिक बात नहीं की भैया भी ठीक से नहीं बोले भतीजा और भतीजी एक पल,को भी उनके पास नहीं बैठे भाभी ने इस बार लड्डू तक नहीं बनाए थे । माँ हर साल मुँगोड़ी बनवातीं थी इस बार वो भी नहीं बनी थी। जब शाम को रागिनी ने घर जाने की कही तो किसी ने उनसे एक बार भी नहीं कहा कि आज नहीं कल चले जाना जाते समय,उसने भतीजा भतीजी को पाँच पाँच सौ रुपये दिए । बदले में रागिनी को पहली बार कुछ भी नहीं मिला था। वो यह सोचकर घर आई थी कि अब वो कभी मायके नहीं जाएगी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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