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कहानी: आखिर लेना ही पड़ा अवकाश

रमेश चंद्र गंभीर बीमारी से पीड़ित होते हुए भी अपनी नौकरी बिना नागा किए पूरी कर रहे थे पर अचानक उनको तेज बुखार ने घेर लिया। कोशिशों के बाद भी वे नौकरी पर जा नहीं पाए।
छब्बीस जनवरी का पर्व नजदीक था जिसमें अपनी उपस्थिति वे अनिवार्य समझते थे।
रमेश चंद्र जी ने अभी तक चार सी एल का ही लाभ लिया था। अभी उनकी नो सी एल बाकी थी जो उनके रिटायरमेन्ट के बाद बेकार होना थी। फिर भी उनको सी एल लैने का बहुत दुख था। चाहते साथ जाना बैटे को लेकर जो वो भी उसी बुखार से पीड़ित हुआ था। आखिर छब्बीस जनवरी को उनसे रहा नहीं गया ओर वे हिम्मत जुटाकर चल ही पड़े। सत्ताइस किलोमीटर का सफर था कई बार मोटरसायकिल काबू से बाहर हुई दुरघटना होते होते बची फिर भी वे आयोजन में शामिल हो ही गए। वहाँ से जैसे तैसे घर तो आ गए। लेकिन जो बुखार ने जकड़ा तो वे रिटायरमेन्ट के दिन तक भी ठीक न हो सके। बेटा उनको ऐसी स्थिती में ही लाया। इसके वे पन्द्रह दिन बाद ठीक हो सके थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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