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कहानी: स्मृति शेष

प्रकाश सर अस्सी व्रष की उम्र में मृत्यु को प्राप्त होने वाले सेवानिवृत प्रधानाध्यापक हरीष जी की अंत्येष्टि में शामिल, होने के बाद घर आए थः और उन्हीं की स्मृतियों में खोए हुए थे प्रकाश सर उनके साथ,पन्द्रह वर्ष तक मीर,गाँव के स्कूल में टीचर रहे थे हरीश सर ,बहुत अच्छे इंसान थे उनकः साथ प्रकाश सर की बहुत यादें जुडी सुई थीं।
प्रकाश सर,की तब नई नौकरी,लगी थी तब वे मीरगंज में ज्वाइन करने आए थे उस समय शाला प्रभारी हरीश सर थे हरीश सर की सादगी देखचर वे खुद चकित हो गए थे हरीश सर उसी गाँव के रहने वाले थे उनके पास पचास एकड़ उपजाऊ जमीन थी दो चार साल,में एकाध बार वे बैंक से अपना वेतन निकालते थे। लेकिन कभी उन्होंने अपनी संपन्नता पर अभिमान नहीं किया था उनके यहाँ पन्द्रह नौकर काम करते थे उन से वे परिवार की सदस्य की तरह व्यवहार करते थे उनमें से एक नौकर हरखू ने तो उन्हें बचपन में गोद में खिलाया था। उन्हें वे पिता के समान आदर,देते थे। मीरगाँव में हाईस्कूल था उसमें प्राचार्य का स्थानान्तरण हो जाने पर हरीश सर प्रभारी बन गए थे ।उन दिनों प्रकाश जी के पिताजी बीमार थे उनकी देखभाल में प्रकाश जी को स्कल,आने में विलंब हो जाता था उन्हें स्कूल में आते देख हरीश सर थोड़ी देर के लिए स्कूल से बाहर चले जाते जब प्रकाश सर कक्षा में पहुँच जाते तब आते ।अगर कोई और शिक्षक देर से आते तो उनकी अच्छी खबर लेते थे । एक बार की बात है वे जन शिक्षा केन्द्र प्रबारी होने के कारण मगजपुर की माध्यमिक शाला का निरीक्षण करने गए थे और,निर्देश देकर,आए थे कि साढ़े चार बजे से पहले अगर शाला बंद,की तो सख्त कार्यवाही करूँगा । तभी रोशन सर जो मगजपुर से दो किलोमीटर दूर पाडलिया गाँव के शिक्षक थे वे तेजी से आते दिखाई दिए उनकी बस बस स्टेण्ड से रवान हो गई थी और वे घबरा रहे,थे क्योंकि वो आखिरी बस थी तभी हरीश सर ने सर को अपनी मोटर सायकिल पर बिठाया और तेजी से बस का पीछा कर एक किलोमीटर दूरी पर जाकर उसे मिला लिया बस में बिठाते हुए वे,रोशन सर,से बोले साढ़े तीन बजे स्कूल,की छुट्टी कर,दिया करो ताकि आपकी बस नहीं छूटे । रोशन सर सोच रहे थे कि जनशिक्षा केन्द्र प्रभारी होने के बाद भी वे उन्हें साढ़े तीन बजे स्कूल बंद करने की कह रहे हैं साथ में यह भी कह रहे हैं सर मैं आपका अहित नहीं होने दूँगा आप किसी बात की चिंता मत करना। उनके,लाखों रुपये उधारी में डूब गए थे मगर,इसकी उन्सें कोई चिंता नहीं,थी । कभी वे किसी के साथ यात्रा करते तो सारे खर्च खुद उठाते थे उनचे साथ वाले का एक भी पैसा खर्ट नहीं करने देते थे। वे एक निर्दोष इंसान,थे उनची कि सी बात का किसी को बुरा नहीं लगता था ऐसे उनके कई उदाहरण थे जो सारे के सारे भलाई के थे उन्होंने कभी किसी का बुरा नहीं किया था उनके अंतिम संस्कार में अपार जनसमूह शामिल हुआ था जो उनकी लोकप्रियता का प्रमाण था। प्रकाश सोच रहे थे कि हरीश जो तो हमेशा के लिए इस दुनिया से चले गए अब तो उनकी स्मृतियाँ ही शेष रह गऍईं थीं।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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