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कहानी: पैंशन प्रकरण

राजेन्द्र वर्मा जी को रिटायर हुए पूरे पाँच महीने हो गए थे उनकी पेंशन प्रकरण का अभी तक निपटारा नहीं हुआ था अभी न उन्हें ग्रेच्युटी मिली थी न जी पी एफ की राशि ही मिली थी वे पिछले पाँच माह से ऑफिसों के चक्कर लगा लगा कर परेशान हो गए थे उनकी आर्थिक स्थिति बुरी तरह डगमगा गई थी मगर उनकी मदद करने वाला कोई नहीं था उन्होंने सिर्फ रिश्वत देने से इंकार,किया था जिसका नतीजा उन्हें ये मिला था।
बात छः महीने पुरानी है। तब राजेन्द्र वर्मा जी के रिटायरमेन्ट में एक माह का समय बाकी था तब उन्हें संकुल केन्द्र के बाबू दिनेश ने घर बुलाया था वे उसके घर पहुँचे तो बाबू ने कहा देखिए वर्मा जी आपके प्रकरण में यह पेंच आ रहा है कि अगर आपकी परिविक्षा अवधि जोड़कर पेंशन निर्धारित करें तो आपकी छः लाख की रिकवरी निकल रही है और अगर दो साल बाद से आपकी गणना करें तो कोई रिकवरी नहीं निकलने वाली इसके अलावा आपके और भी बिल हैं जिनका भुगतान होना है इसके लिए आपको एक लाख रुपये देना होंगे अगर आप पैसे देने को तैयार हैं तो आपके सारे काम हो जाएँगे तथा दस दिन में आपके पूरे भुगतान हो जाएँगे अगले महीने से पेंशन भी जमा होने लगेगी। एक लाख रुपये की बात सुनकर वर्मा जी हक्के बक्के रह गए बोले मेरे साथ के और भी शिक्षक रिटायर हुए हैं उनची तो कोई रिकवरी नहीं निकली उनके प्रकरण तो समय पर हल हो गए बाबं बोला उन्होंने भी पैसा दिया था ।तब उनका काम हुआ वर्मा जी बोले मैं एक लाख रुपये कहाँ से लाऊँगा मुझे बिटिया की शादी करना है मकान बनवाना है एक लाख रुपये बड़ी रकम है उन्होंने रुपये देने से इंकार कर दिया था जिसके कारण उनके पेंशन प्रकरण का अभी तक निराकरण नहीं हुआ था बल्कि छः लाख रुपये की रिकवरी निकाल दी थी इस पर श्री वर्मा ने अपने वकील से नोटिस बी इ ओ को भिजवाया था जिस पर अधिकारियों ने नाराजी जताते हुए कहा कि अब अदालत में जाकर आदेश लाओ तभी आपका काम होगा। श्री वर्मा जी इससे बहुत,तनाव में थे उनका मामला बिगड़ चुका था दस हजार रुपये महीने दवाओं पर खर्च करना पड़ रहे थे पत्नी की झुमकी वे बेच चुके थे ।अब सोच रहे थे कि अपनी आधा तौले सोने की अंगूठी बेचकर इस महीने का खर्च तो चला लें फिर अगले महीने की बाद में सोचा जाएगा। मन ही मन में वे घबरा भी रहे थे कि अगर फिर भी पेंशन नहीं मिली तो वे क्या करेंगे श्री वर्मा जी करमनखेड़ी गाँव के प्राथमिक स्कूल से रिटायर हुए थे वे सहायक शिक्षक थे तथा शाला का प्रभार भी उनके पास था वो भी एक समस्या थी कार्यरत शिक्षक ओमप्रकाश ने चार्ज लेने से इंकार कर दिया था। समाधान की कोई सूरत नजर नहीं आ रही थी दिनेश कह रहा था कि तब तो हम आपका काम एक लाख रुपये में करने को तैयार थे मगर अब पंरे दो लाख रुपये लगेंगे। इस खबर ने उनका रहा ससा चैन भी छीन लिया था। घर जब शाम को आए तो पत्नी सुशीला ने कहा कि मकान मालिक आया था पाँच महीने का किराया माँग रहा था। नहीं तो बेदखल करने की वमकी दे रहा था । पत्नी की बात सुनकर राजेन्द्र बोले पेंशन प्रकरण के जल्दी निराकरण की कोई उम्भीद नहीं है। किराया देने की बात तो दूर घर का खर्च चलाना भी मुश्किल हो रहा है। अब तो एक ही उपाय है हम वृद्धाश्रम चलते हैं। वहीं रहेंगे जो भी काम मिलेगा वो करेंगे। भूखे मरपे की नौबत तो नहीं आएगी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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