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कहानी: आठ लड़के

हर स्वरूप के आठ लड़के थे। आठों लगभग अनपढ़ तथा जाहिल थे जबकि उसके छोटे भाई किशन स्वरूप के एक ही लड़का था अजय। दोनों भाइयों के पास पच्चीस पच्चीस एकड़ जमीन थी पूरा परिवार खेती करता था। किशन स्वरूप के पिताजी रामस्वरूप के निधन के बाद से दोनों भाइयों के बीच अक्सर तनाव की स्थिति निर्मित होने लगी थी।
तनाव का मुख्य कारण यह था कि अजय के पास पूरी पच्चीस एकड़ जमीन थी। बाकी आठों भाइयों के पास कुल तीन तीन एकड़ जमीन ही थी। वे खेती के कार्य में भी लापरवाही बरतते थे। जिसके कारण उन्हें आठ आठ महीने दूसरों के खेतों में काम करना पड़ता था। अजय अच्छी तरह जानता था कि अगर वो कमजोर रहा तो यह सारे भाई उसे मारपीट कर भगा देंगे तथा उसकी सारी जमीन छीन लेंगे। इसलिए उसने दिमाग से काम लेना शुरू किया। उन्हें गाँव में कोई कर्ज नहीं देता था अजय ने पक्की लिखापड़ी करके उन्हें कर्ज देना शुरू कर दिया और धीरे धीरे सारे भाईयों की सारी जमीन अजय ने खरीद ली। इसके साथ ही उसने पेट्रोल पंप खोल लिया, वेयर हाउस खोल लिया तथा आटा, मैदा मिल भी खोल ली। आठों भाइयों को उसने अच्छे वेतन पर मिल में काम दे दिया था। उन सबका पिछला बकाया कर्ज भी माफ कर दिया था। अजय जिला ग्राम पंचायत सदस्य था उसकी पत्नी अनीता गाँव की सरपंच थी। हर स्वरूप जो कभी अपने बेटों पर गर्व करते थे आज वे किशन स्वरूप के बेटे अजय से ईर्ष्या करते थे। साथ ही दबते भी थे क्योंकि हर दुख सुख में अजय ही उनकी आर्थिक मदद करता था। उन्हें यह बात अच्छी तरह समझ में आ गई थी कि सिर्फ सँख्या से ही सब कुछ नहीं होता उसमें बुद्धिबल का भी विशेष योगदान होता है।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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